Must Read
Home » Hindi Blogs

Hindi Blogs

एकादशी पर व्रत किस प्रकार किया जाए

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू एकादशी व्रत दोनों हरे कृष्ण भक्तों एवं हिन्दुओं द्वारा चन्द्रमा के बढ़ते हुए शुक्ल पक्ष के ग्यारवे दिन किया जाता है। इस व्रत के पालन के लिए कौन सी चीजें खाई जा सकती हैं, सम्बन्धी कई नियम है जो कि व्रत की सख़्ती के अनुसार बदल सकते हैं। वैष्णव पंचांग के परामर्श के अनुसार ही व्रत करना चाहिये ताकि सही दिन व्रत किया जा सके। एकादशी व्रत धारण करने के नियम पूर्ण उपवास अपनी इन्द्रियों को नियंत्रित करने की बहुत ही उचित क्रिया है, परन्तु व्रत धारण करने का मुख्य कारण कृष्ण का स्मरण/ध्यान करना है। उस दिन शरीर की जरूरतों को सरल कर दिया जाता है, और उस दिन कम सो कर भक्तिमयी सेवा, शास्त्र अध्ययन और जप आदि पर ध्यान केन्द्रित करने की अनुशंसा की गई हैं। व्रत का आरंभ सूर्योदय से होता है और अगले दिन के सूर्योदय तक ... Read More »

एकादशी व्रत और उसका महत्व क्या है?

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू एकादशी पर उपवास क्यों करें – इसकी महत्ता। कन्नड़ भाषा में ऑडियो क्लिप  एकादशी की तिथियाँ और इसका महात्म्य दर्शाती कथाएं  हिंदी में indif.com पर एकादशी व्रत की कथाएं एकादशी – भूमिका, इसका सन्दर्भ इत्यादि  (गौड़ीय वैष्णव परंपरा) वैदिक दिनदर्शिका (बिना मूल्य के उपलब्ध) एकादशी (एवं अन्य तिथियाँ) की गणना विश्व के किसी कोने में करने में सक्षम है। पुष्टिमार्ग एकादशी दिनदर्शिका  आपके शहर का पंचांग / पंचांगम एकादशी की तिथियाँ और उनका महात्म्य  वर्ष की एकादशी तिथियाँ विश्व का पंचांग के प्रयोग से अपने नगर की एकादशी व्रत की तिथि पता लगायें।  मैं भारतीय पंचांग को विदेश में प्रयोग क्यों नहीं कर सकता (एकादशी की तिथियाँ विदेश में भारतीय पंचांग से अलग होती हैं। ) ऊपर दी गयी जानकारियों के लिए कृपया  http://en.wikipedia.org/wiki/Ekadashi पर जाएँ । एकादशी क्या हैं? संस्कृत शब्द एकादशी का शाब्दिक अर्थ ग्यारह होता है। एकादशी पंद्रह दिवसीय पक्ष (चन्द्र मास) के ग्यारवें दिन आती है। ... Read More »

बुरी आदतों की अनदेखी न करें

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू सभी माताजी और प्रभुजी को हरे कृष्ण। कृपया मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें । श्रील प्रभुपाद और गुरुदेव की जय । “अभ्यास करने से ही श्रेष्ठता आती है” यह उक्ति सभी आदतों पर लागु होती है, चाहे बुरी या अच्छी। अत: यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि हमें ध्यान देते रहना चाहिये कि हम रोजमर्रा में क्या सुनते हैं, क्या देखते हैं अथवा क्या करते हैं। परन्तु बुरी आदतें बड़ी चोरी छुपे हमारे अन्दर प्रवेश करती हैं, इससे पहले कि हम कुछ समझ पाए वे हमारे जीवन का इस प्रकार हिस्सा बन जाती हैं कि हमें उनका व्यसन हो जाता हैं और बाद में उनका त्याग करना बड़ा दुष्कर हो जाता हैं। बुरी आदतें कैंसर के समान होती हैं। अगर आरंभिक चरण में इसकी जाँच हो जाए तब उसका इलाज आसानी से हो सकता है। परन्तु अगर जाँच अंतिम चरणों में हो, तो ... Read More »

स्वतंत्रता

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू सभी माताजी और प्रभुजी को हरे कृष्ण। कृपया मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकार करें। श्रील प्रभुपाद और गुरुदेव की जय। इस संसार में हर कोई मुक्त रहना चाहता है। एक विद्यालय जाने वाला बच्चा सोचता है कि वह विद्यालय से बाहर निकल कर मुक्त हो सकता है। कॉलेज जाने वाला छात्र, जो गृहकार्यों और परीक्षाओं से त्रस्त रहता है, सोचता है कि एक बार उसकी नौकरी लग जाए तब वह मुक्त हो जाएगा। नौकरी लगने के बाद मनुष्य सोचता हैं कि वह अवकाश प्राप्त होने पर मुक्त हो जाएगा। ना केवल मनुष्य जाती अपितु पिंजड़े में बंद पशु पक्षी और जीव जंतु भी बंधन से मुक्त होकर अत्यंत सुख का अनुभव करते हैं। अतएव हर प्राणी अपने जीवन के हर चरण पर मुक्त होने का इच्छुक होता है। परन्तु वास्तविकता में हम पाते हैं कि हम कभी मुक्त नहीं होते अपितु भौतिक त्रिगुणों के जाल में ... Read More »

श्रीमदभागवतम सर्वोत्कृष्ट है

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू यह हमारा अत्यंत सौभाग्य है कि हमें हमारे अति प्रिय गुरुभाई परम पूज्य देवकीनंदन प्रभुजी का अत्युत्तम संग मिला। उन्होंने अबुधाबी की सूखी धरती पर श्रीमदभागवतम रुपी अमृत की बाढ़ ला दी। प्रभुजी श्रील गुरुदेव के प्रति आज्ञाकारिता की प्रतिमूर्ती है, और गहन अध्ययन के साथ वे श्रीमद भागवतम को अपने दैनिक जीवन में प्रयोग भी करते है। हम उनसे सीख सकते है किस प्रकार हम अपने आध्यात्मिक गुरु की श्रद्धा पूर्वक सेवा कर सकते हैं।  अपनी इस यात्रा के दौरान, उनके सभी प्रवचनों का मुख्य और एक मात्र विषय सिर्फ भागवतम की और ही केन्द्रित था। प्रभुजी ने जोर देकर कहा कि केवल शास्त्रीय अध्ययन करने से उत्तम है, उसे अपने जीवन में रोजमर्रा में प्रयोग करना, यही उसका असली मूल्य है । श्रील प्रभुपाद के द्वारा कथित एक अत्युतम ध्यान देने योग्य कथन है जिसमें वे श्रीमद भागवतम के बारे ... Read More »

जिह्वा एवं वाणी की आतुरता

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू आज मैं भक्त के जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष, भौतिक जगत में अपनी भक्ति को बनाये रखने के लिए उसके संघर्ष पर बात करना चाहूँगी। हमने स्वयं गौर किया होगा कि कई परिस्तिथियों में हमारी जिह्वा हमारे नियंत्रण में नहीं रह सकी है। सही बात गलत समय बोलना या फिर गलत बात सही समय पर बोलना दोनों ही समान रूप में अपमानजनक होती है। कई बार जिह्वा पर नियंत्रण रह ही नहीं पाता। वास्तव में गप-शप करना क्या है? संस्कृत में इसे ग्राम्य कथा कहते है। गप-शप और कुछ नहीं बस दो लोगों का किसी तीसरे की बुराई करना है। भौतिक संसार में एक छोटी सी चीज भी एक बड़ा मुद्दा क्यों बन जाती है? भौतिक जगत में दो लोग में जैसे ही निकटता बढ़ती हैं, उनमे शत्रुता क्यों हो जाती है? संस्कृत की यह उक्ति “अतिपरिचयास्तव अवज्न्या” परिदृश्य में क्यों आ ... Read More »

माता पिता का आदर करना

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू मैंने हमारे अतिप्रिय गुरुदेव के भगवद्गीता के श्लोक २.१४ पर दिए गए प्रवचन को सुना था। सबके लाभ के लिए मैंने उनके अमृतमय शब्दों को यहाँ संकलित करने का विचार किया है। मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:। आगमापायिनो ‘नित्यास्तान्स्तितिक्षस्व भारत।।  “हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुःख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान, सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है। हे भारतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिये कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे।” ऊपर दिया गया श्लोक त्रिताप से मुक्ति पाने का उपाय है। अगर हम ध्यानपूर्वक सोचे तो आध्यात्मिक, आदिभौतिक और आदिदैविक क्लेशों से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। उनका सामना करने का एकमात्र मार्ग उनको सहन करना है। श्री कृष्ण भी यहाँ यही कह रहे हैं कि सभी सुख अथवा दुःख जो हम अपने जीवन में पाते हैं अस्थायी होते ... Read More »

एकाग्र चित्त वृत्ति

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू श्रील प्रभुपाद कहते हैं, “ अगर परम सत्य की अनुभूति जीवन का चरम लक्ष्य है, तब उसे प्रत्येक संभव तरीके से करना होगा“, “प्रत्येक संभव तरीके” अत्यधिक ध्यान देने योग्य शब्द हैं। परन्तु यह कैसे किया जा सकता हैं? चलिए देखते हैं। मानव समाज संपूर्ण विश्व में चार जातियों और चार जीवन के चरणों (आश्रमों) में विभाजित है। चार जातियाँ हैं बुद्धिमान जाति (ब्राह्मण), योद्धा जाति (क्षत्रिय), उत्पादक जाति (वैश्य) और श्रमिक जाति (शुद्र)। इन जातियों का विभाजन मनुष्य के कार्य और उसकी योग्यता के अनुरूप किया गया है, जन्म के अनुसार नहीं। फिर जीवन काल के चार चरण क्रमवत इस प्रकार है, छात्र जीवन (ब्रह्मचर्य), घर का संचालक (गृहस्थ), अवकाश प्राप्त (वानप्रस्थ) और त्याग पूर्ण (संन्यास)। समाज के उचित हित के लिए जीवन के ऐसे विभाजन होने चाहिये, वरना कोई भी सामाजिक संस्थान स्वस्थ रूप से प्रगति नहीं कर सकती है, और प्रत्येक ... Read More »

अँधा अनुसरण ना करें

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू हम में से अधिकतर लोगों की नक़ल करने की आदत होती हैं। पश्चिमी सभ्यता की नक़ल करने से आज हमारा पतन हो रहा है। श्रील प्रभुपाद ने कड़ी महनत कर के वैदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना की है, वो चाहते थे कि हम १०० वर्ष पूर्व चले जाए और वैदिक पद्धति से जीवन जीए, क्योंकि हमारे जीवन की सार्थकता वैसे जीवन में ही है। हमारी कथित शिक्षा के बावजूद, हम आँखें मूँद कर औरों की नक़ल करते हैं बिना यह सोचे कि वह हमारे लिए सही है भी कि नहीं। उदाहरण के तौर पर, भारत एक उष्णकटिबंधीय देश होने के कारण यहाँ का मौसम ज्यादातर गर्म ही रहता है परन्तु विद्यालय जाने वाले बच्चों को जबरदस्ती पश्चिमी देशों की नक़ल में पूरे अंग्रेजी कपडे, टाई और जूते पहनने होते हैं। इसके कारण कई स्वास्थ्य संबंधित समस्याएँ होती हैं। बच्चे धोती और कुर्ता को नहीं जानते। जैसा कि महाराज कहते ... Read More »

भाग्य को स्वीकारे भाग – 7

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू यह लेख हमारे प्रिय गुरु भाई परम पूज्य देवकीनंदन प्रभुजी के द्वारा गत २७ मई २०११ को चेन्नई में श्रीमद्भागवत के श्लोक संख्या ७.२.४० पर दिए गए प्रवचन को लिपिबद्ध करने के प्रयास की अंतिम कड़ी है। 7. हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथ देखें: श्रीमद्भागवत के श्लोक संख्या ७.२.४० का निष्कर्ष बहुत ही सुन्दर है। जब तक हम हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथ नहीं देखेंगे तब तक हम भगवान् के द्वारा दिए भाग्य को हम अपने भाग्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे। जब प्रतिकूल स्थिति हो, मुसीबतें आयें तब हमें व्याकुल नहीं होना चहिये। हम कुछ क्षणों के लिए परेशान हो सकते हैं लेकिन यह सब हमारी साधना और श्रद्धा पर निर्भर करता है। जब आपकी साधना और श्रद्धा अच्छी होगी और साधु संग होगा, हमारी निराशा शुरू होने से लेकर हमारी उससे उत्पन्न हुई उत्कंठा से बाहर ... Read More »