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अँधा अनुसरण ना करें

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

हम में से अधिकतर लोगों की नक़ल करने की आदत होती हैं। पश्चिमी सभ्यता की नक़ल करने से आज हमारा पतन हो रहा है। श्रील प्रभुपाद ने कड़ी महनत कर के वैदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना की है, वो चाहते थे कि हम १०० वर्ष पूर्व चले जाए और वैदिक पद्धति से जीवन जीए, क्योंकि हमारे जीवन की सार्थकता वैसे जीवन में ही है। हमारी कथित शिक्षा के बावजूद, हम आँखें मूँद कर औरों की नक़ल करते हैं बिना यह सोचे कि वह हमारे लिए सही है भी कि नहीं। उदाहरण के तौर पर, भारत एक उष्णकटिबंधीय देश होने के कारण यहाँ का मौसम ज्यादातर गर्म ही रहता है परन्तु विद्यालय जाने वाले बच्चों को जबरदस्ती पश्चिमी देशों की नक़ल में पूरे अंग्रेजी कपडे, टाई और जूते पहनने होते हैं। इसके कारण कई स्वास्थ्य संबंधित समस्याएँ होती हैं। बच्चे धोती और कुर्ता को नहीं जानते। जैसा कि महाराज कहते हैं इनसे हवा का प्रवाह शरीर के सभी अंगों तक पहुँचने में सुविधा होती है। मध्य पूर्व, जो कि मरू स्थल क्षेत्र है, वहाँ बच्चों और बड़े जिनको दफ्तर जाना होता हैं, को पश्चिमी पोशाकें पहननी पड़ती है जिसके कारण हमें वातानुकूलन की जरूरत होती है जिसके कारण ना केवल व्यय में बढ़ोतरी होती है बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण में भी समस्याए आती हैं। डरबन, साऊथ अफ्रीका में हो रहे एक प्रवचन में हमारे प्रिय गुरुदेव परम पूज्य महाविष्णु गोस्वामी महाराज ने हमें सलाह दी कि हमें आँखें बंद करके दूसरों की अनुसरण बंद कर देना चाहिए। सब के लाभ के लिए मैं उनके प्रवचन के कुछ अंश यहाँ लिपिबद्ध कर रही हूँ।

“कई बार हम बिना समझे लोगों का अनुसरण करते हैं। नक़ल नहीं उतारनी चाहिए क्योंकि हम नहीं जानते कि किन परिस्थितियों में इनका अनुगमन किया जाता है। अमेरिका में जो भी प्रचलित हो, वो भारत में आ जाता है। ऐसा अँधा अनुसरण हमारा कुछ भला नहीं करता।

श्रील प्रभुपाद ने अच्छी कथा बताई थी। बन्दर नक़ल करने में उस्ताद होते हैं। जैसा हम करेंगे, वे भी वैसा ही करेंगे। किसी एक वन में पेड़ पर बहुत से बन्दर थे और वहाँ कुछलकड़हारे भी थे और उस समय लकड़ी काटने के यन्त्र नहीं हुआ करते थे। इसलिए उन लकड़हारों को अपने हाथों से आरी चला कर लकड़ी काटनी पड़ती थी। इसलिए पूरा दिन वे लकड़ी काटा करते थे। एक दिन एक लकड़हारा पेड़ काट रहा था परन्तु अँधेरा हो गया था और उसने आधी कटाई ही की थी। इसलिए वह घर वापिस लौटना चाहता था। इसलिए उसने आधे कटे हुए हिस्से में स्प्लिन्टर फँसाया ताकि अगले दिन वो वापिस आकर स्प्लिन्टर हटाकर वापिस कटाई शुरू कर सके। बंदरों ने लकड़हारों को लकड़ी काटते हुए देखा था। जैसे ही लकड़हारे अपने निवास्थान लौट गए, दो बन्दर पेड़ से नीचे उतरे और वे भी लकड़ी काटना चाहते थे। उनके पास आरी नहीं थी, परन्तु वे ऐसा नाटक कर रहे थे जैसे कि उनके पास आरी हो। उनमे से एक बन्दर लकड़ी के लट्ठे पर बैठ गया और उसकी पूँछ स्प्लिन्टर के छेद में आ गई। स्प्लिन्टर के कारण ही दो हिस्से अलग अलग थे। इसलिए उसमे एक छिद्र था। बन्दर उस पर बैठा और उसकी पूँछ उस छिद्र में आ गई और मूर्खता से उसने वो स्प्लिन्टर निकाल दिया। इसलिए दोनों हिस्से एक साथ आ गये और उसकी पूँछ उसमे फँस गयी। वो संघर्ष करता रहा कि किसी तरह उसकी पूँछ छूट जाए। दूसरे बन्दरों ने देखा कि उसका मित्र मुसीबत में है। इसलिए वे भाग गया और परन्तु यह बन्दर परिश्रम किये जा रहा था लेकिन फिर भी उसकी पूँछ नहीं छूट पाई। इस कारण उसकी पूँछ कट गई। इसलिए अब सात फीट लम्बी पूँछ की बजाय, उसकी अब छह इंच छोटी पूँछ थी। वो दूसरे बंदरों के पास गया और उन बंदरों ने देखा कि इसकी पूँछ अब छह इंच लम्बी ही है। उन्होंने सोचा यह कोई नया प्रचलन है और उन सभी ने अपनी पूँछ काट डाली। सभी सात फीट लम्बी पूँछें कट कर अब छह इंच की रह गयी थी।

कृपया बन्दर ना बने। आप सोचे कि आप क्या कर रहे हैं। कृष्ण ने आपको एक अच्छा दिमाग सोचने के लिए दिया हैं। आप सोचे, शास्त्रों को पढ़े। श्रील प्रभुपाद हमें गुमराह नहीं करेंगे। तुम्हारे पास उनकी लिखित सौ से अधिके पुस्तकें हैं। आप कोई भी छोटी सी पुस्तक खरीदे, ‘Path of perfection ‘ या ‘matchless gift ‘ या ‘coming back ‘। कितनी ही छोटी छोटी पुस्तकें हैं, किसी एक को भी पढ़ने का प्रयास करो, वह तुम्हे अच्छी अनुभूति देंगी। हमारे शास्त्र बहुत ही व्यावहारिक हैं। वे ऊपर ऊपर आकाश में नहीं उड़ते। वे हमारे दैनिक जीवन से जुड़े हुए हैं।”

इसी विचार के मत में श्रील प्रभुपाद के द्वारा भगवद्गीता का श्लोक संख्या ३.२४ में दिया गया तात्पर्य स्मरणीय हैं।:

“अनुसरण और अनुकरण एक से नहीं होते। हम गोवर्धन उठाकर भगवान् का अनुकरण नहीं कर सकते, जैसा कि भगवान ने अपने बाल्यकाल में किया था। ऐसा कर पाना किसी मनुष्य के लिए संभव नहीं। हमें उनके आदेशों का पालन करना चहिये, किन्तु किसी भी समय अनुकरण नहीं करना है। श्रीमद्भागवत में(१०.३३.३०-३१) इसकी पुष्टि करते है-

नैतत्समाचारेज्जातु मनसापि ह्यानिश्वर:।
विनाश्यत्याचारन मौढ़याद्याथारुद्रो ’ब्धिजं विषं।।
इश्र्वराणाम वचः सत्यम / तथैवाचरितं क्वचित।
तेषां यत स्ववचोयुक्तं बुद्धिमान्स्तत समाचरेत।।

मनुष्य को भगवान् तथा उनके द्वारा शक्तिप्रदत्त सेवकों के उपदेशों का मात्र पालन करना चाहिए। उनके उपदेश हमारे लिए अच्छे हैं और कोई भी बुद्धिमान पुरुष बताई गयी विधि से उनको कार्यान्वित करेगा। फिर भी मनुष्य को सावधान रहना चाहिए कि वह उनके कार्यों का अनुकरण न करे। उसे शिवजी के अनुकरण में विष का समुद्र नहीं पी लेना चाहिए।

हमें सदैव ईश्वरों की या सूर्य तथा चन्द्रमा की गतियों को वास्तव में नियंत्रित कर सकने वालों की स्थिति को श्रेष्ठ मानना चहिये। ऐसी शक्ति के बिना कोई भी सर्वशक्तिमान ईश्वरों का अनुकरण नहीं कर सकता। शिवजी ने सागर तक के विष का पान कर लिया, किन्तु यदि कोई सामान्य व्यक्ति विष की एक बूँद भी पीने का यत्न करे तो वह मर जाएगा। शिवजी के कई छद्मभक्त हैं जो गांजा तथा ऐसी ही अन्य मादक वस्तुओं का सेवन करते रहते हैं। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि इस प्रकार शिवजी का अनुकरण करके वे अपनी मृत्यु को निकट बुला रहे हैं। इसी प्रकार भगवान् कृष्ण के भी अनेक छद्मभक्त हैं जो भगवान् की रासलीला या प्रेमनृत्य का अनुकरण करना चाहते हैं, किन्तु यह भूल जाते हैं कि वे गोवर्धन पर्वत को धारण नहीं कर सकते। अतः सबसे अच्छा तो यही होगा कि लोग शक्तिमान का अनुकरण न करके केवल उनके उपदेशों का पालन करें। न ही बिना योग्यता उनका स्थान ग्रहण करने का प्रयत्न करना चाहिए। .

बहुत बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरदेव की सेवा में रत आपकी ,

वैजयंतीमाला देवी दासी,
अबू धाबी