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जिह्वा एवं वाणी की आतुरता

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया

प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

आज मैं भक्त के जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष, भौतिक जगत में अपनी भक्ति को बनाये रखने के लिए उसके संघर्ष पर बात करना चाहूँगी। हमने स्वयं गौर किया होगा कि कई परिस्तिथियों में हमारी जिह्वा हमारे नियंत्रण में नहीं रह सकी है। सही बात गलत समय बोलना या फिर गलत बात सही समय पर बोलना दोनों ही समान रूप में अपमानजनक होती है। कई बार जिह्वा पर नियंत्रण रह ही नहीं पाता। वास्तव में गप-शप करना क्या है? संस्कृत में इसे ग्राम्य कथा कहते है। गप-शप और कुछ नहीं बस दो लोगों का किसी तीसरे की बुराई करना है। भौतिक संसार में एक छोटी सी चीज भी एक बड़ा मुद्दा क्यों बन जाती है? भौतिक जगत में दो लोग में जैसे ही निकटता बढ़ती हैं, उनमे शत्रुता क्यों हो जाती है? संस्कृत की यह उक्ति “अतिपरिचयास्तव अवज्न्या” परिदृश्य में क्यों आ जाती है? लोग क्यों उन लोगों की जिनका उनके जीवन में कोई मतलब नहीं रखते हैं की तुलना में अपने निकट प्रियजनों से ज्यादा क्यों चोट खाते हैं? एक सर्वेक्षण के अनुसार एक औसत मनुष्य दिन भर में ५०० शब्द बोलता। तो फिर दिन प्रतिदिन मित्रता का दूषित क्यों होती जा रही है?

आज की दुनिया में छोटे परिवार की संख्या संघटित परिवार के तुलना में इतनी ज्यादा क्यों है? पड़ोसियों ने एक दूसरों के घर में जाकर आपस में खुशियाँ बाँटना क्यों बंद कर दिया है? क्या आपने कभी ऐसा सोचा हैं? चलिए इन्हें शास्त्रों के अनुसार देखे। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं -

वाचो वेगं मनसः क्रोध-वेगं
जिह्वा वेगं उदरोपस्था वेगं

यहाँ वाचो का अर्थ वाणी है और वेगं का अर्थ आतुरता है। मनसः मन है और उदरोपस्ता का अर्थ पेट एवं गुप्तांग है।

वाचो सबसे प्रथम आता है। क्यों? क्योंकि बोलने की शक्ति का प्रयोग गलत प्रयोजनों में किया जा रहा है। लोग अपनी वाचा को दूसरों के दोषों पर चर्चा करने में प्रयोग करते हैं। अगर वे दफ्तर में हो तो वहाँ वे अपने किसी सहकर्मी पर गप-शप करेंगे या अपने boss की बुराई। अगर घर में होंगे तो अपने घर के नौकरों में गलतियाँ ढूँढने की बातें करेंगे। अगर नौकरों की नहीं तो वे अंततः अपने सम्बन्धियों में बुराईयाँ निकाल कर उस पर गप-शप में लग जायेंगे। अगर किसी से कोई छोटी सी भी गलती हो जाए, तो बातों की शक्ति से वे अंततः उस छोटी सी गलती को इतना बड़ा मुद्दा सिर्फ इसलिए बना देते हैं ताकि वे उन्हें अपमानित करके आनंद उठा सकें। जब सामने वाला व्यक्ति निरुत्तर हो जाता है तब लोग सोचते हैं कि उन्होंने वाक-युद्ध से उस पर विजय पा ली हैं। लोगों में तलाक लेने की दर इन वाद-विवाद के झगड़ों के कारण ही बढ़ रही हैं। आज युद्ध करने के लिए किसी अस्त्र-शास्त्र की जरूरत नहीं है। लोग सिर्फ बातों के प्रयोग से संबंधों को तोड़ने में विशेषज्ञ हो गए हैं। जैसे कि कहा जाता है, माता एवं पुत्र के बीच का शुद्ध प्रेम भी आज इसलिए दूषित हो जाता है क्योंकि दोनों में से कोई ना कोई वाणी का गलत प्रयोग कर देता है। आज के दिन भाईचारे या पड़ोसियों के परस्पर प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि किसी ने किसी को किसी एक दिन कुछ कह दिया था। अगर आप दो लोगों को बाहरी रूप से घनिष्ट मित्र देखते हैं, वह मित्रता ज्यादा दिन नहीं टिकती अगर वे ज्यादा देर तक साथ रहते हैं। आखिर ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि वाणी की शक्ति का दुरूपयोग हो रहा है।

अब आप सब सोच रहे होंगे, मैं वाणी की शक्ति पर इतना विशेष ध्यान क्यों दे रही हूँ? हमारे आस पास स्थित ऊपर दी गई हर चीज को गलत क्यों माना गया हैं? और अगर वे चीजें गलत हैं और लोगों को व्यथित ही करती हैं तो फिर उचित क्या है? वाचा, वाणी की शक्ति का वास्तविक सही उपयोग क्या है?

श्रील रूप गोस्वामी समझाते हैं – वाचा का सही प्रयोग सर्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण के महिमा गान में है। श्रील प्रभुपाद कहते हैं, वे लोग जो भौतिक वार्ताओं में लगे रहते हैं, वे उन मेढकों की तरह हैं, जो तालाब में टर्राते रहते हैं और सोचते हैं कि वो गा रहे हैं, जबकि वे सर्प के रूप में मृत्यु को निमंत्रण दे रहे होते हैं। हाँ, यह सर्वथा सच है। हमने ऊपर जो भी चर्चा की, वाणी के गलत प्रयोग के मद में, वे सभी मृत्यु, व्यग्रता और समाज के पतन को निमंत्रण ही है।

अगर सब का लक्ष्य एक ही हो, सब का दृष्टिकोण सिर्फ भगवान के गुणगान करना ही हो, तब किसी के जीवन में कभी कोई समस्या आएगी ही नहीं। अगर हम हर समय जब भी बोले तो सिर्फ, सर्वेश्वर श्री कृष्ण की ही चर्चा हो, उनका स्वरुप, उनकी लीलाएं,उनके नाम, उनका यश, उनका इस संपूर्ण ब्रह्माण की अभिव्यक्ति को बनाने में उनका प्रभुत्व, उनका विस्तार, उनकी पसंद, उनकी नापसंद, उनकी उनके भक्तों के साथ की गयी लीलाएं। कैसे वे भक्तों की रक्षा करते है, कैसे बदले में भक्तों की कीर्ति बढ़ाते हैं, कैसे हमारे प्रेम का प्रतिदान करते हैं- तब हमारी वाचा शुद्ध होगी।

जब कभी हम किसी नए व्यक्ति से मिलते हैं, अगर हम उनसे भगवत चेतना के बारे में बात करें और उन्हें कृष्ण से यह कहने “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” के मंच पर ले आये तो इस भौतिक जगत में आपने आधा युद्ध जीत ही लिया हैं। हम अपने आप को किसी द्वन्द में नहीं पायेंगे। श्रील प्रभुपाद कहते थे, कृष्ण और उनके नाम अभिन्न हैं।

हमारे महान आचार्य, श्रील भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपनी वाचा का प्रयोग भगवान् के ३०० करोड़ बार नाम जप करने में किया था और तब जाकर उन्होंने पूरे भारत में कृष्ण भावनामृत का विस्तार करने का मिशन शुरू किया। उन्होंने भगवान् के द्वारा दी गयी वाचा का श्रेष्ट उपयोग अपने जीवन में किया। उन्होंने अपनी संपूर्ण शिक्षा और अनुभवों को भगवान् के महिमामण्डन में लगा दिया। वे एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे। यह कैसे संभव हुआ? यह इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने अपनी वाचा का दुरूपयोग इस भौतिक जगत की बेकार बातों की चर्चा में नहीं किया। वे जब भी बोलते तो वे सिर्फ कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु के मिशन के बारे में ही बोलते। उनकी जिह्वा का प्रयोग सिर्फ भगवान् के गुणगान और प्रसादम ग्रहण करने के लिए ही होता था।

जैसा कि ऊपर दिए गए श्लोक में वर्णित है, श्रील रूप गोस्वामी कहते है “जिह्वा वेगं उदरोपस्ता वेगं ” अर्थात अगर कोई अपनी वाणी पर नियंत्रण पा ले तो अपने उदर एवं यौन भोग पर नियंत्रण आसान हो जाता है। अगर हम सिर्फ प्रसादम खाए, रेस्तराओं और अन्य खाने की दुकानों पर नहीं, तो अपने उदर और यौन भोग जैसी शरीर की माँगों पर नियंत्रण करना बहुत बेहतर हो जायेगा। यह हमारे शरीर के एक ही क्रम में आते हैं। अगर पेट्रोल चलित गाड़ी में डीजल भरा जाए तो वह वांछित परिणाम नहीं देगी। उसी प्रकार हमारा शरीर भी सिर्फ कृष्ण प्रसादम ग्रहण करने के लिए बना है। शरीर को व्यर्थ अवांछित खाद्य पदार्थों का भोग कराने से अंततः उसका परिणाम शरीर में खराबी और संताप ही होगा।

जब हम क्रोध पर नियंत्रण की बात कहते हैं, तो वास्तविकता में वह वाचा पर ही नियंत्रण पाने की बात है। क्रोधवश लोग वो सारी बातें कह डालते हैं जो अन्यथा उन्हें नहीं कहनी चहिये। परन्तु ऐसा होता है। क्रोध के पीछे एक उत्तम विज्ञान है। अगर हम तमो और रजो गुण युक्त भोजन करेंगे तो जाहिर है मन से बना हुआ हमारा सूक्ष्म शरीर भी प्रभावित होगा ही, उसका कुपरिणाम यह होगा कि जब भी दिमाग में कोई उत्तेजना या विरोध उत्पन्न होगा तब जिह्वा का और भी गलत प्रयोग अपशब्दों के बोलने में होगा। जब जिह्वा को भगवान् को न अर्पित भोजन करने से नहीं रोका जाएगा और उसे सिर्फ स्वाद-ग्रंथियों की तृप्ति के लिए भोजन करने दिया जायेगा, तब उसका नियंत्रण क्रोध में अपशब्द न कहने पर भी नहीं रखा जा सकेगा। हम सभी ने गौर किया हैं कि आज के छोटे बच्चे बड़ों से जबान लड़ाने में जिह्वा का प्रयोग बिना किसी नियंत्रण के करते हैं। यह इसी का परिणाम है। एक शुद्ध भक्त कभी दूसरों की निंदा करने में लिप्त नहीं होता। वह प्रसादम के अलावा और कुछ नहीं खाता। इस प्रकार वह अपने मन, क्रोध में की गई क्रियाओं, जिह्वा, उदर और यौन भोग की इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है।

मैं भगवान् श्री कृष्ण, श्रील प्रभुपाद, श्रील गुरुदेव के पादपद्मों में प्रार्थना करती हूँ कि वो मुझे अपनी जिह्वा पर नियंत्रण रखने की शक्ति दे ताकि मैं वाचा का सदुपयोग कर सकूँ।

बहुत बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरदेव की सेवा में रत आपकी,
विनयशीला देवी दासी,
इंदौर