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भाग्य को स्वीकारे भाग – १

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

सभी प्रभुजी अथवा माताजी को हरे कृष्ण ।

कृपया मेरा विनम्र प्रणाम स्वीकारें! श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की जय!

दिया गया लेख हमारे प्रिय गुरुभाई परम पूज्य देवकीनंदन प्रभुजी द्वारा चेन्नई गत् २७ मई २०११ को श्रीमद्भागवत श्लोक संख्या ७.२.४० पर दिए ज्ञानवर्धक प्रवचन को लिपिबद्ध करने के विनम्र प्रयास है।

पथि च्युतं तिष्ठति दिष्टरक्षितं
गृहे स्थितं तद्विहतम विनश्यति ।
जीवत्यनाथोपि तदिक्षितो वने
गृहे ‘भिगुप्तो ‘स्य हतो न जीवति ।।

कभी कभी कोई व्यक्ति सार्वजनिक मार्ग पर अपना धन खो देता है, जो सभी को सदृश होता है, पर फिर भी उसका धन नियति द्वारा सुरक्षित होता है अपितु यह किसी को दृश्य नहीं होता। इसलिए वह धन उसे पुनः वापस मिल जाता है। और दूसरी तरफ अगर भगवान् का संरक्षण न हो तो घर पर अति सुरक्षा के साथ रखा हुआ धन भी खो जाता है। इसलिए अगर भगवान् का संरक्षण हो तो किसी रक्षक के न होते हुए भी जंगल में मनुष्य जीवित बच जाता है, लेकिन अपने घर पर सगे सम्बन्धियों द्वारा रक्षित व्यक्ति भी कभी कभी मर सकता है अगर उसे ईश्वर का संरक्षण नहीं प्राप्त हो।

1. हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं: यह श्लोक महाराज को बहुत ही विनोदपूर्ण एवं ज्ञानपूर्ण लगता था। श्रीमद्भागवत के श्लोक ७.९.१९ में प्रह्लाद महाराज प्रार्थना करते हैं -

बालस्य नेह शरणं पितरौ नरसिंह 
नार्तस्य चागदमुदंवति मज्जतो नौ :।
तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहान्जसेष्ट-
स्तावाद्विभो तनुभृताम त्वदुपेक्षितानाम ।।

मेरे प्रभु, नृसिंह देव, हे परमेश्वर, जीवन में शरीर को ही स्व मानने की धारणा के कारण बद्ध जीवात्मा आपके द्वारा न संरक्षित और अपेक्षित होने के कारण अपने उत्थान के लिए कुछ नहीं कर सकती। चाहे जो भी उपचार वह स्वीकारे, अल्प समय के लिए लाभदायक हो सकता है परन्तु चिरस्थायी नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ माता पिता अपने बच्चे की रक्षा नहीं कर सकते, एक वैद्य और औषधि पीड़ित रोगी को राहत नहीं दे सकते और समुद्र में नौका डूबते व्यक्ति को नहीं बचा सकती।

यहाँ प्रह्लाद महाराज तीन उदाहरण देते हैं कि भगवान् का संरक्षण कितना शक्तिशाली है, और हम चाहे कुछ भी कर ले, हम संसार में तब तक कुछ नहीं कर सकते जब तक भगवान् की कृपा ना हो। उनकी आज्ञा के बिना घास का एक तिनका भी नहीं हिल सकता है। विश्व में कोई ऐसा ठग या अपराधी नहीं हो सकता जो उनकी आज्ञा के बिना कोई अपराध की योजना बना सके। यह बहुत ही शक्तिशाली कथन है।

प्रह्लाद महाराज कहते हैं, हम अधिकांशतः अपने बच्चों से अत्यधिक प्रेम करते हैं। परन्तु जब बच्चा रोगग्रस्त होता है, हम असहाय स्थिति में आ जाते हैं। हम हर प्रकार से सुनिश्चित करना चाहते है कि बच्चा ठीक हो जाए लेकिन हर भरसक प्रयास के बाद भी सही समय आने से पहले बच्चा ठीक नहीं हो पाता। दूसरा उदाहरण वैद्य का है। जब हम रोगग्रस्त होते हैं, संसार की कितनी भी धन संपत्ति हमारे पास क्यों न हो, धन से रोग का उपचार नहीं हो सकता। दुनिया का श्रेष्ठ डॉक्टर भी हमारी सहायता नहीं कर पायेगा। अगर कृष्ण की मर्जी न हो तो, संसार का कोई भी डॉक्टर हमारे जीवन की अवधि एक इंच क्या एक क्षण भी अपने निर्धारित समय से लम्बा नहीं खीच सकता। तीसरा उदाहरण बहुत ही श्रेष्ठ है। वो कहते हैं, एक डूबते हुए व्यक्ति के लिए सागर में तैरती नौका का क्या उपयोग है। डूबते हुए आदमी को तैरना नहीं आता। इसलिए समुद्र में एक नाव के सदृश होने पर भी क्योंकि उसे तैरना नहीं आता वो वहाँ पहुँच नहीं पायेगा और डूब जायेगा। इसलिए प्रह्लाद महाराज स्पष्टता से कहते हैं, जब तक कृष्ण की कृपा न हो, कृष्ण की मर्जी न हो, कोई सम्भावना है ही नहीं कि संसार में कुछ भी किया जा सकता हो।

श्रीमद्भागवत ७.२.४० में दिए गए उदाहरण बहुत ही व्यवाहारिक हैं। हम कितनी बार ऐसी परिस्थिति में पड़ चुके हैं। हम में से कुछ लोगों ने सड़क पर रुपयें खोये होंगे और पुनः लौट कर आने पर उन्हें पा भी लिया होगा। परन्तु अगर आपने सुरक्षा के साथ बैंक में रुपयें रखे हो, हो सकता है मुद्रास्फीति या किसी और कारणवश वे अपना मूल्य खो दे। हम में से कितनो ने ऐसे रुपयों को सुरक्षित रखने की चेष्टा की हैं। मेरे पिताजी की यह आदत थी। वे कुछ चीजों को इतनी सुरक्षा से रखते थे कि वे स्वयं भूल जाते कि वो कहाँ रखी है, फिर आधा समय सिर्फ उसे ढूँढने में निकल जाता और अगर मैं पूछता कि उन्होंने उस चीज को कहाँ रखा हैं तो वे कहते कि मैंने उसे ऐसे अच्छे स्थान पर रखा है कि अब मैं स्वयं यह भूल चुका हूँ। अगर कृष्ण चाहे तो, कितनी भी अच्छी तरह से रखी वस्तु को वस्तुतः हम खो देंगे क्योंकि वे हमारी याद करने की स्मृति ही छीन लेंगे। परन्तु अगर कोई वस्तु अस्त वयस्तता से भी रखी गयी हो, कृष्ण उसकी रक्षा करें तो कोई उसे छू भी नहीं सकता।

अतः इसलिए महाराज जब भी यह श्लोक पढ़ते तो हँसने लगते क्योंकि वे कहते, “स्वाभाव मात्र से हर प्राणी एक नंबर का कंजूस होता है। हम अपने धन से इतना अधिक प्रेम करते हैं कि उससे अलग होना हमारे लिए अति कष्टप्रद होता है। कई बार कृष्ण अपना ही तरीका निकाल लेते हैं हमें अपने रुपयों से अलग करने के लिए। और अंततः या तो वह रूपये उनकी सेवा में चले जाते हैं, या माया की सेवा में या फिर अगर ज्यादा ही संभाल के रखे गए हो और जब हम मर रहे हो तो हमें अनुभव होता है कि हम उसे अपने साथ नहीं ले जा सकते। जब हमें इस बात का अनुभव होता हैं कि हमारे साथ कुछ भी नहीं आ सकता, तब हम अपना भाग्य भी स्वीकार सकते हैं। यह बहुत ही महत्वपूण है, जब आप यह नहीं स्वीकारते कि हमारे साथ कुछ भी ना जाता तब आप कुछ भी नहीं स्वीकार सकते। इसलिए हमें सदैव अपने मृत्यु के दिन का स्मरण रहना चाहिये।”

महाराज यह बात लाखों बार कहते रहते थे कि जब तक आपको यह याद नहीं रहेगा कि आप एक दिन मरने वाले हैं, तब तक आप सोचते रहेंगे कि सब कुछ आपके नियंत्रण में है, पर वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। सच में यह सत्य कथन है। इसलिए ही अलेक्सेंडर महान- वह एक शूर वीर योद्धा था, महान विजेता था परन्तु जैसा कि हम सब जानते हैं ऐतिहासिक तौर पर उसके विश्व भर को जीतने के बाद भी अंततः उसकी मृत्यु साधारण से ज्वर के कारण हो गयी, वह भी जब वह अपने राज्य के पराक्रम के चरम पर था। मृत्यु के समय उसकी आयु बहुत कम थी, उसने अपने मंत्रियों से कहा कि उसकी तीन इच्छाएं हैं जिन्हें उन्हें उसकी मृत्युपर्यंत पूरा करना है। “पहली इच्छा थी कि जब तुम मुझे ताबूत में डालो तो तुम्हे उसे खोल के सुनिश्चित करना होगा कि मेरे हाथ बाहर हो। मेरी हथेलियाँ बाहर की तरफ निकली हो।” फिर उसने कहा, “मेरे सभी वैद्य जो मुझे बचाने के लिए सघन प्रयास कर रहे हैं, मेरे मरने के बाद उन्हें मेरा ताबूत उठा कर ले जाना होगा, और तीसरी मेरे पास सिक्कों में जो भी धन हो उन्हें सड़कों पर बिखेर देना।” उन मंत्रियों ने पूछा कि विस्तृत प्रबंध आखिर क्यों करने हैं, तब उसने कहा, “मृत्यु को निकट आते देख मैंने एक बात अनुभव की है। मैं चाहता हूँ कि लोग यह जाने कि जब कोई संसार छोड़ता है, उसकी हथेलियाँ कुछ भी नहीं ले जा सकती। मैं अपने साथ ग्रीस नहीं ले जा सकता। मैं अपने साथ रोम नहीं ले जा सकता। मैं कुछ भी नहीं ले जा सकता।यह शरीर तक भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। दूसरी बात, मैं चाहता हूँ कि सभी जाने कि वे वैद्य कौन हैं जिन्होंने मेरा उपचार किया था, यह इसलिये नहीं कि जनता उन पर पत्थर फेंके, अपितु इसलिए कि सब जाने कि वे कितना भी भरसक प्रयास क्यों न कर ले जब मेरा समय आएगा वे कुछ नहीं कर पाएंगे। तीसरी बात कि मैं मर जाता हूँ मेरे सारे सिक्कों को सड़कों पर बिखेर दिया जाए ताकि लोग यह जान सके कि ये सिक्के जिनके कारण मैंने एक के बाद एक राज्यों पर विजय पाई थी, दुर्भाग्यवश आज मृत्यु काल में वे मेरी रक्षा नहीं कर सकते।” यह सुन सबने उसकी प्रशंशा कि यह बहुत अच्छी बात है। परन्तु अलेक्सेंडर ने अंत में एक और बात जोड़ी, “यह सब अच्छा हैं, पर तुम इस बात का भी अनुभव करोगे कि जब सिक्कों को नीचे फेंका जाएगा,हर कोई उन सिक्कों को उठा लेंगे और उसे कसकर अपने हाथों में पकड़ेंगे और घर जाते हुए यही सोचेंगे कि मैंने इन सिक्कों को बचा लिए है। विश्व का यही सत्य है कि हम कभी भी अपने शिक्षा नहीं सीखते हैं।” हम अपनी शिक्षाएं तब तक नहीं सीखते जब तक हम कृष्ण के पास नहीं जाते, इसी कारण हमारे लाखों जन्म बीत गए हैं और आशा करते है कि और लाखों जन्म नहीं लगेंगे हमें यह सीखने में कि हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं और सब कुछ उनके ही हाथों में हैं।

यह जाने बिना कि भाग्य हमारे नियंत्रण में नहीं है हम कितनी ही योजनायें बनाते हैं जबकि कृष्ण की योजना ही सर्वोच्च होती हैं। अगला प्रश्न उठता है, कृष्ण की योजना क्या है यह कैसे जाना जाए, प्रभुजी की इसी बात की विवेचना अगली प्रस्तुति में कृष्ण कृपा होने पर दी जाएगी।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और गुरुदेव की सेवा में रत आपकी,
वैजयंती माला देवी दासी,
चेन्नई ।