भाग्य को स्वीकारे भाग – २

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

इसके पूर्व की प्रस्तुति में हमने देखा कि प्रभुजी ने इस बात की विवेचना की कि हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं सब कुछ भगवान् के हाथों में हैं। इसलिए भाग्य हमारे नियंत्रण में नहीं है। परन्तु हम फिर भी बहुत सी योजनायें बनाते हैं। अतः कृष्ण की योजना को कैसे जाना जाए? हम अब आगे की प्रतिलिपि के साथ आगे बढ़ते हैं।

2. कृष्ण की योजना कैसे जाने? - श्रीमद्भागवत के श्लोक ७.१०.६४ में मय दानव कहता है,

देवो’सुरों नरो’न्यो वा नेश्वरो’स्तीहा कश्चन।
आत्मनो ‘न्यस्य वा दिष्ट दैवेनापोहितुम द्वयो:।। 

मय दानव ने कहा: “परमेश्वर भगवान् ने हमारे लिए या किसी दूसरे के लिए जो भी निर्धारित कर दिया है, दोनों को ही हमारे अथवा दूसरों के लिए उन निर्धारित चीजों को कोई भी कही भी नहीं बदल नहीं सकता, चाहे वह देवता हो, असुर हो, मनुष्य हो या फिर और कोई।”

अगर कृष्ण ने हमारा हिस्सा निर्धारित कर दिया है तो वह हमारे लिए ही आरक्षित रहेगा। न उससे ज्यादा न ही उससे कम। श्रील प्रभुपाद अपने शक्तिशाली तात्पर्य में लिखते हैं:- मय दानव कहता है, “मैं या तुम कितनी भी योजना बना ले, भगवान् के द्वारा जो निर्धारित है वही होता है। उनकी आज्ञा के बिना किसी की कोई योजना संपन्न नही होती” हम अपने आप बहुत सी योजनायें बनाते हैं, परन्तु परमेश्वर भगवान्, विष्णु की मंजूरी के बिना वे कभी संपन्न नहीं हो सकते। हजारों लाखों योजनायें नित्य प्रतिदिन हर प्रकार के प्राणियों के द्वारा उद्भूत होती हैं परन्तु भगवान् की मंजूरी के बिना वे सभी व्यर्थ हैं।

अब समस्या यह है कि हम हर समय प्रश्न कर सकते हैं, ” ठीक है। कृष्ण की योजना ही सर्वोच्च है। हम कैसे जाने कि यह योजना क्या है? कम से कम अगर हमें जब उनकी योजना पता होगी तब हम उनकी योजना के अनुसार चलेंगे।”महाराज कहते हैं यह भी झूठ है क्योंकि सत्य यह है कि कृष्ण हमसे क्या चाहते हैं यह विदित होने पर भी हमारा स्वाभाव तर्क करने का है।फिर भी हम स्वभाववश बहस करते हैं, “कृष्ण मैं यह सब स्वीकार करता हूँ, परन्तु… मेरे पास एक प्रश्न है।” हमारी गलती यही है कि हम सोचते हैं कि हम कृष्ण के साथ भी तर्क कर सकते हैं। हमारे तर्क सिर्फ वकालत तक ही सीमित नहीं रहते। अपितु सत्य तो यह है कि, हमें कृष्ण जो भी देते हैं हम उससे कभी संतुष्ट नहीं रहते और संतोष की कमी के कारण हम अपनी निर्धारित नियति को अच्छी तरह प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और हम कृष्ण के द्वारा दी गयी लहरों के विपरीत जाने का प्रयास करते हैं, स्वाभाविक ही है कि फिर हम संतप्त होते हैं। श्रील प्रभुपाद ने इस स्थिति पर एक अद्भुत बात कही है। वे पहाड़ की चोटी पर कुछ शिष्यों के साथ चढ़े और वहाँ से उन्होंने लहरों को देखा। लहरें जोर जोर से चट्टानों की तरफ आकर टकरा रही थी, तब प्रभुपाद कहते हैं, “क्या तुम जानते हो कि इन लहरों में मछलियाँ भी हैं और जब ये लहरें चट्टानों पर आकर टकराती हैं, ये मछलियाँ कभी नहीं मरती। परन्तु उसी स्थान पर अगर हाथियों को रख दिया जाए, वो तत्क्षण उसी पानी से कुचल दिया जायेंगे। परन्तु वे मछलियाँ बच जाती हैं।” इसलिए उन्होंने सभी शिष्यों से पूछा ऐसा क्यों होता है और वे अवाक रह गए, अंततः प्रभुपाद कहते हैं, “ऐसा इसलिए क्योंकि मछलियों का समुद्र के साथ अन्तरंग सम्बन्ध है, वहीँ दूसरी और हाथियों का समुद्र से कोई जुडाव नहीं है। क्योंकि मछलियों का समुद्र के साथ गहरा सम्बन्ध है इसलिए वे समुद्र के बहाव के विरुद्ध नहीं जाती और समुद्र उनकी रक्षा करता है। हाथियों को कुछ पता न होने के कारण वे समुद्र के आगे अपनी छोटी सी शक्ति को पानी के बहाव के विपरीत जाने में लगा देंगे और परिणामस्वरूप कुचले जायेंगे।

ये एकदम ठीक ठीक वही बात है जो वह श्लोक कहना चाहता हैं। इसी कारण हम भाग्य से निराश होते हैं। जब हम कुछ चाहते हैं और वह हमें प्राप्त नहीं होता, हम असंतुष्ट हो कृष्ण को दोष देते हैं। कृष्ण पर जबकि दोषारोपण नहीं होना चाहिये। हम उन्हें सुनते ही नहीं। इसी कारण महाराज कहते थे, “दूसरों के घरों को देख कर कृपया आप अपनी झोपड़ी ना जला डाले।”यह एक सुन्दर तथ्य है। जो भी प्राप्त हो उसमे संतुष्ट रहे क्योंकि जो भी हमें अपने आप मिलता हैं हम उसी के योग्य होते हैं। परन्तु जो अतिरिक्त श्रम से प्राप्त होता है वह कुछ क्षण तो साथ देता है परन्तु अंततः अतिरिक्त श्रम के क्षीण होने के साथ वह भी क्षीण हो जाता है; अंततः आपको कार्मिक फलों को भी भुगतना होगा। यह स्वीकारने के लिए हमें धैर्य और कृष्ण में विश्वास की आवश्यकता होती हैं। महाराज कहते थे, “अगर भक्ति मार्ग में हमारे अन्दर धैर्य नहीं हो तो हम आश्वस्त नहीं रह सकते और एक बार अधीर होने के बाद हम अस्पताल के रोगी जैसे हो जाते हैं।” यह जीवन में एक दूसरी समस्या है। परन्तु जो धैर्यवान होते हैं, वे मछलियों के सामान होते हैं; भाग्य से जो भी मिले वो शांत बने रहते हैं। उन्हें कुछ भी नहीं होता। अतः कृष्ण की योजना कैसे जाने यही मुख्य समाधान हैं। महाराज कहते थे, “ कृष्ण की मर्जी जानने का श्रेष्ठ तरीका है कि आप यह स्वीकार ले कि आप नहीं जानते कि कृष्ण की योजना क्या है। यह उनकी योजना को समझने का प्रारंभ है। भीष्मदेव बहुत सुन्दरता से श्रीमद्भागवत श्लोक १.९.१६ में यही बात कहते हैं,

न ह्यस्य कर्हिचिद्राजन पुमान वेद विधित्सितम। 
यद्विजिज्ञासया युक्ता मुह्यन्ति काव्यो ’पि हि।।

हे राजन, भगवान् [श्री कृष्ण] की योजना कोई नहीं जान सकता। यद्यपि महान विचारक विस्तृत रूप से अनुसंधान करते हैं, वे अंततः भ्रमित ही होते हैं।”

युधिष्ठिर यह सोच कर बहुत खेद कर रहे थे कि महाभारत युद्ध का सम्पूर्ण कारण मुख्यतः उनकी ही गलती और लोभ थे। वे इतने बड़े भक्त थे कि कौरवों के नरसंहार का पूरा उत्तरदायित्व वे अपने ऊपर ले रहे थे परन्तु जब वे भीष्मदेव के समक्ष आये, भीष्मदेव कहते हैं यह सब भगवान् के द्वारा ही प्रायोजित था। भगवद्गीता में कृष्ण श्लोक ११.३३ में कहते है -

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून भुनक्ष्व राज्यं समृद्धम।

 मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन

“इसलिए उठो। युद्ध के लिए तैयार हो अथवा यश प्राप्त करो। अपने शत्रुओं को पराजित कर राज्य सुख का आनंद लो। मेरी योजना से ये पहले से ही मृत्यु को प्राप्त होने वाले हैं। हे सव्यसाची, तुम इस युद्ध में बस निमित्त मात्र बन सकते हो।”

इसलिए स्पष्ट रूप से कृष्ण कहते हैं कि यह उनका ही योजना है। वे कहते हैं, ” मारने वाला मैं हूँ अर्जुन। तुम नहीं मार रहे हो। यह मेरे द्वारा निर्णित है, अमुक सैनिक मरेगा, अमुक सैनिक का सर कटेगा, अमुक सैनिक तीर का निशाना बनेगा। इसलिए मैं उन्हें मात्र देख कर मार दे रहा हूँ। यह मेरी योजना है।” अर्जुन पूछते हैं, “तब मैं क्या करू? मेरे तीर चलाने का फिर क्या अर्थ है?” कृष्ण कहते हैं, ” हे श्रेष्ठ धनुर्धारी! कृपया ध्यान दो तुम तीर जरूर चलाते हो लेकिन किसी को भी मारते नहीं हो” यह अतिश्योक्ति हो गयी! क्यों है न? महाराज कहते थे कि यह दिव्य व्यंग है। कृष्ण के पास युद्ध शुरू होने के क्षणों में भी हास्यबोध के लिए समय था। अतः वे कहते हैं, ” तुम सव्यसाची हो ( तीर चलने में माहिर) परन्तु बेकार हो। तुम सव्यसाची हो, परन्तु तुम्हारे तीर अपने लक्ष्य को तब तक नहीं भेद पाएंगे जब तक मैं निर्धारित न करूँ।” वे हमें इसी प्रकार शिक्षा देना चाह रहे हैं, क्योंकि अर्जुन वास्तविकता में श्रेष्ठ हैं। वे उनसे कह रहे हैं, ” अर्जुन तुम्हारे अन्दर उच्चतम योग्यता होगी। अगर तुम सोचते हो कि तुम वह व्यक्ति हो जिसमें इतनी योग्यता है, तब तुम गलत हो। सभी योग्यता अगर किसी में है तो वह मुझमें है, परन्तु मैं यह योग्यता तुम्हे उधार में दे रहा हूँ। एक बार प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर, वह योग्यता वापस ले ली जाती है।” इसी कारण जब संपूर्ण महाभारत लड़ा जा चुका था हम देखते हैं कि अर्जुन श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्द के पन्द्रवे अध्याय में कई सुन्दर श्लोक बोलते हैं। श्लोक १.१५.२१ में वे कहते हैं

तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते
सो’हं रथी न्र्पतयो यत आनामन्ति।
 
सर्वं क्षनेना तदभूदासदिशारिकतम
भस्मन्हुतम कुहकाराद्धामिवोप्तमुश्याम।।

मेरे पास वही गांडीव धनुष है, वही तीर है, उन्ही घोड़ों द्वारा खीचा गया वही रथ है, और मैं उनका प्रयोग उसी अर्जुन की तरह करता हूँ जिसका सभी राजाओं ने उचित सम्मान किया है। परन्तु कृष्ण की अनुपस्तिथि में, वे सभी, एक क्षण मात्र में निरर्थक अथवा शून्य हो गए हैं। यह ऐसा ही है जैसा कि, राख में शुद्ध घी डालना या जादुई छड़ी से धन अर्जित करना या फिर बंजर धरती पर बीज बोना।”
अर्जुन कहते हैं, “मुझे में या मेरी किसी भी चीज में अब कोई शक्ति या सामर्थ शेष नहीं बचा है और यह इसलिए है क्योंकि कृष्ण ऐसा नहीं चाहते हैं। अतः यहाँ हमें भगवान् की मर्जी स्वीकारने का संकेत मिलता है और उनकी इस योजना का किस प्रकार पालन करना चाहिये इसकी जो विवेचना देवकी प्रभुजी ने की है उसकी प्रतिलिपि कृष्ण कृपा होने पर अगली प्रस्तुति में दी जायेगी।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की सेवा में रत आपकी
वैजयंती माला देवी दासी।

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