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भाग्य को स्वीकारे भाग – 4

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

इसके पूर्व की प्रस्तुति में हमने देखा कि प्रभुजी ने इन बातों की विवेचना की -

1. हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं सब कुछ भगवान् के हाथों में हैं। इसलिए भाग्य हमारे नियंत्रण में नहीं है।

2. हम बहुत-सी योजनायें बनाते हैं। अतः कृष्ण की योजना को कैसे जाना जाये? प्रभुजी ने बताया कि इसकी शुरुआत यह स्वीकारने मात्र से हो जाती है कि हमें उनकी योजना ज्ञात नहीं है।

3. अब अगला प्रश्न है कि कृष्ण की योजना को कैसे स्वीकारा जाए और इसकी शुरुआत यह मान लेने से हो जाती है कि हमें वह चीज नहीं चाहिये जो कृष्ण हमारे लिए नहीं चाहते हैं।

उनकी योजना को स्वीकारने के पश्चात, उनक निष्पादन कैसे करें? यहाँ प्रभुजी समझाते है कि ऐसा हमें श्रद्धा से और ईर्ष्या मुक्त होकर करना होगा।

पूर्व प्रस्तुति में श्रद्धा के बारे में बताया गया था। यहाँ हम अनसूया - ईर्ष्या मुक्त भाव की विवेचना करेंगे।

4.कृष्ण की योजना का निष्पादन कैसे करें? हमें कृष्ण के प्रति कभी ईर्ष्यालु नहीं होना चाहिये। मैंने एक बार महाराज से पूछा, ” महाराज, स्पष्टता से बोलू तो मुझे पूरा विश्वास है कि मैं कृष्ण के प्रति ईर्ष्यालु नहीं हूँ क्योंकि कृष्ण मेरे लिए ईर्ष्या भाव रखने के लिए बहुत ऊँचे हैं। कम से कम मुझे कोई मेरा प्रतिद्वंदी तो मिलना चाहिये, तब मैं समझ सकता हूँ कि मैं उसके प्रति ईर्ष्यालु हूँ। अतः हम कृष्ण के प्रति ईर्ष्यालु कैसे हो सकते हैं?” महाराज ने मुझे कुछ ऐसी बातें कही जिन्होंने मुझे पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा, ” तुम कृष्ण के प्रति ईर्ष्यालु हो।” मैंने कहा, ” कैसे? मैं सच में उनके प्रति ईर्ष्यालु नहीं हूँ। मैं उनके लिए प्रसन्न हूँ। वे जो भी करते हैं इत्यादि मुझे अच्छा लगता है। मेरी उनसे कोई प्रतियोगता नहीं है। मुझे उनका सुदर्शन चक्र या और कुछ नहीं चाहिये। अतः मैं कृष्ण के प्रति कैसे ईर्ष्यालु हूँ?” महाराज ने कहा, “जब आप किसी के प्रति ईर्ष्यालु होते हैं, उसका लक्षण होता है कि आप उसके निर्देशों का अनुगमन नहीं करते हैं। अगर आप किसी के प्रति ईर्ष्यालु हो तो आप कभी उसकी नहीं सुनते।” और तब मैंने सोचा, ” हाँ यह सत्य है।” महाराज कहते हैं, ” क्योंकि हम ईर्ष्यालु हैं, हम उस व्यक्ति को नहीं सुनते, और इसी कारण हमें कृष्ण नहीं मिलते।” महाराज कहते हैं,”उसी प्रकार जब हम अपने आध्यात्मिक गुरुदेव के प्रति ईर्ष्यालु होते हैं हम उनके निर्देशों की अनसुनी कर देते हैं। इसलिए महाराज ने कहा,” कोई कह सकता है – महाराज मुझे आप से कोई ईर्ष्या नहीं है, परन्तु अगर तुम मेरे निर्देशों का पालन नहीं करते हो तो मैं यही समझूंगा कि तुम मेरे प्रति ईर्ष्यालु हो औरउस ईर्ष्या का लक्षण है तुम्हारे अनुसरण करने का अभाव।” कितना सशक्त कथन है यह। जीवन में प्रथम बार मैं ईर्ष्या मुक्त भाव और श्रद्धा में सम्बन्ध देख पा रहा था। महाराज कहते हैं कि इसलिए भगवद्गीता ३.३१ में ‘श्रद्धावंतो अनासुयन्तो‘ डाला गया है। श्रद्धा और इर्ष्या मुक्त भाव एक के बाद एक आते हैं। अगला प्रश्न है कि एक बार निर्देशों का पालन करने लगने से क्या होता है?

5. प्रारब्ध से मुक्ति : जब कोई कृष्ण के निर्देशों का पालन बिना ईर्ष्या के और श्रद्धा के साथ करता है तो वह मुक्त हो जाता है। संसार से मुक्त नहीं। महाराज यह गहन दृष्टि से कहते हैं, वह अपने भाग्य से मुक्त हो जाता है। वह पूर्ण रूप से कृष्ण के संरक्षण के आश्रय में आ जाता है। तब उसका भाग्य भी बदल जाता है। भौतिक जगत में जो भी आपकी नियति होगी, जिस क्षण आप कृष्ण भावनामृत में आ जाते हैं, तब वहाँ सिर्फ कृष्ण का शासन होता है। वे तुम्हारा भाग्य निर्धारित करते हैं। अगर भाग्य कृष्ण से भी बड़ा है तो फिर भाग्य ही भगवान् हुआ। अतः कदापि ऐसा न सोचें कि कृष्ण भाग्य नहीं बदल सकते। वे सबसे बड़े स्वामी हैं। वे ऐसे ही कोई भी नियम बदल सकते हैं। वे कह सकते हैं, “यह नियम कहाँ है? मुझे कभी यह ज्ञात नहीं था।” उन्होंने ऐसा किया हैं। उन्होंने हर संभव नियम को झुका दिया हैं हर संभव भक्त के लिए। उन्होंने ऐसा किया हैं।

जब अर्जुन का युद्ध राजा जयद्रथ के साथ हो रहा था, कृष्ण उनकी रक्षा दुर्योधन के बाणों से करने का प्रयास कर रहे थे, एक बाण इतनी तीव्रता से आया कि वह अर्जुन के भौहों के मध्य भाग में लगने वाला था, महाभारत बताती है कि उस क्षण, कृष्ण ने बस इतना किया कि उन्होंने आधा फुट करीब नीचे कदम लिए, जिस क्षण उन्होंने ऐसा किया पूरा का पूरा रथ आधा फुट नीचे चला गया और वह बाण अर्जुन के मुकुट को स्पर्श करते हुए उड़ते हुए निकल गया। जब कृष्ण ने निर्णय किया कि राजा जयद्रथ का अंत अब होना चाहिये, वह उनसे डेढ़ मील दूर था और आधी से ज्यादा सेना का नाश हो चुका था, तब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ” यह अति सरल है। मैं ऐसी स्थिति कर देता हूँ जिससे सूर्य को बादल ढक लेंगे।” यह तो धोखाधड़ी हुई। क्यों है ना? बादल जैसे ही सूर्य को ढक लेंगे सभी कौरव अपने अस्र नीचे रख देंगे और कहेंगे, ” बहुत अच्छा। अब जो होना था हो चुका। अब जयद्रथ जीवित रहेगा और अर्जुन को अपना वह वचन पूरा करना पड़ेगा क्योंकि अगर वह राजा जयद्रथ को नहीं मारता है तो उसे अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्यागने होंगे।” इसलिए अर्जुन कृष्ण की तरफ देखते हैं और कृष्ण कहते हैं, “क्या तुम बस एक काम कर सकते हो? जब मैं बादलों से अँधेरा कर दूंगा, मैं अचानक से उन्हें जाने दूंगा और फिर सूर्य पुनः आ जायेगा। तुम जयद्रथ से एक मील दूर हो। क्या तुम उस पर निशाना लगा सकते हो? क्या तुम एक ऐसा बाण चला सकते हो जिससे वह मारा जाये?” अर्जुन कहते हैं, “आपके होते हुए मैं कुछ भी कर सकता हूँ।” कृष्ण की कृपा होने पर सब कुछ संभव है। इसलिए जैसे ही उचित मौका आया जब कृष्ण एक मील दूर थे और संध्या के ५:३० हो रहे थे और कौरव सोच रहे थे कि बस कुछ क्षण और फिर अर्जुन मृत होगा। कृष्ण बादलों को बुला सूर्य को गायब कर देते हैं। वे सब देखते हैं कि सूर्य ढल गया है और कहने लगते हैं, “हमने कर दिखाया!” जयद्रथ जो एक मील दूर था उसे सन्देश भेज दिया जाता है कि वह अब सुरक्षित है। वह अत्यधिक प्रसन्न होता है। वह अपने रथ से उतरता है, और तभी कृष्ण सभी बादलों को हटा देते हैं, कौरव अकस्मात् कह उठते हैं,” एक मिनट रुको। अभी समय समाप्त नहीं हुआ है”, परन्तु वे उलझन और हैरानी से बाहर निकल पाते, उससे पहले कृष्ण कहते हैं, “निशाना लगाओ! निमित्त मातरम् भाव: सव्यसाचिं!” इस बार अर्जुन पूरे विश्वास के साथ निशाना लगातें हैं, उन्हें विश्वास है कि कृष्ण ने उनकी नियति निर्धारित कर दी थी, इसलिए इस श्रद्धा के साथ कि वे भगवान् की दृष्टि में संरक्षित हैं, अर्जुन अपना लक्ष्य साधते हैं। उनके बाण की गति इतनी अधिक होती है कि जयद्रथ का सर कट जाता है और वह सीधे मीलों दूर जयद्रथ के पिता की गोद में जा गिरता है।

महाभारत की एक और घटना है जिसमें कृष्ण भीम की रक्षा दुर्योधन से करते हैं। उसकी सुन्दर व्याख्या देवकी प्रभुजी आगे करते हैं, कृष्ण कृपा होने पर आने वाली प्रस्तुति में उसे दिया जायेगा।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की सेवा में रत
वैजयंती माला देवी दासी,
चेन्नई।