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भाग्य को स्वीकारे भाग – 5

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

इसके पूर्व की प्रस्तुति में हमने देखा कि प्रभुजी ने इन बातों की विवेचना की

  1. हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं सब कुछ भगवान् के हाथों में हैं। इसलिए भाग्य हमारे नियंत्रण में नहीं है।
  2. हम बहुत सी योजनायें बनाते हैं। अतः कृष्ण की योजना को कैसे जाना जाये? प्रभुजी ने बताया कि इसकी शुरुआत यह स्वीकारने मात्र से हो जाती है कि हमें उनकी योजना ज्ञात नहीं है।
  3. अब अगला प्रश्न है कि कृष्ण की योजना को कैसे स्वीकारा जाए, और इसकी शुरुआत यह मान लेने से हो जाती है कि हमें वह चीज नहीं चाहिये जो कृष्ण हमारे लिए नहीं चाहते हैं।
  4. उनकी योजना को स्वीकारने के पश्चात उनका निष्पादन कैसे किया जाए? यहाँ प्रभुजी ने बताया कि उसे श्रद्धापूर्वक और ईर्ष्या रहित भाव से करना होगा।

भगवान् की इच्छा का निर्विवाद अनुगमन करने के परिणाम स्वरुप हम अपने भाग्य से मुक्त हो जाते हैं। हमने पूर्व दिए गए लेख में जयद्रथ वध की कथा पढ़ी थी। यहाँ हम दुर्योधन और गांधारी की एक कथा के साथ आगे बढ़ते हैं।

5. भाग्य से मुक्ति: जब जयद्रथ का वध भगवान् श्री कृष्ण की चतुर योजना के कारण संपन्न हुआ, जब वह भयंकर घटना घटित हुई। दुर्योधन रात्रि में विह्वल हो ऊपर नीचे घूम कर चिंतन कर रहा था,” यह सब क्या है? बादल आये और फिर चले भी गए! मैं कोई मौसम विशेषज्ञ नहीं हूँ। इस कृष्ण ने अब अति कर दी है।” गांधारी, उसकी माता सोच रही थी,” मुझे अपने पुत्र की रक्षा करनी चाहिये। यह तो बेईमानी है। कृष्ण के उनके पक्ष में होने के कारण उनके सभी काम सहज हो जाते हैं।” गांधारी ने सोचा, “मुझे सिद्धि प्राप्त है।” इसलिए उसने कहा, “प्रिय दुर्योधन, रात्रि में तुम मुझे निर्वस्त्र मिलने आओ। जब तुम मेरे आँखों के समक्ष होगे, मैं अपनी आँखों की पट्टी हटा दूँगी और वर्षों में प्राप्त सिद्धि के तेज के कारण मैं तुम्हे इतनी शक्तिशाली बना दूँगी कि कोई तुम्हे स्पर्श भी नहीं कर पायेगा।” अतः रात्रि के अन्धेरें में (निर्वस्त्र घूमने के लिए किसी को भी रात्रि के गहराने का सहारा लेना ही पड़ेगा) दुर्योधन निश्चय कर बाहर आता है और जाने लगता है। जब सर्वत्र शांति होती है और वह जाने के लिए मुड़ता है और वह किसे देखता है? वह श्री कृष्ण को देखता है। दुर्योधन सोच में पड़ जाता है,” संसार के सभी लोगों में उसे अभी इस व्यक्ति के ही दर्शन क्यों हुए?” श्री कृष्ण उसे देखते हैं और मुस्कुराने लगते हैं। दुर्योधन चिढ़ जाता है। वो कहता है,” आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?” श्री कृष्ण कहते हैं,” तुम सोचो कि मैं क्यों मुस्कुरा रहा हूँ? एक वयस्क व्यक्ति निर्वस्त्र हो रात्रि के अँधेरे में घूम रहा है। क्या तुम पागल हो?” दुर्योधन शर्मिंदा हो कहता है,” नहीं, नहीं। मैं बस अपनी माँ से मिलने जा रहा हूँ। ” श्री कृष्ण कहते हैं,” तुम्हारी माता! तुम अपनी माता से निर्वस्त्र मिलने जा रहे हो? तुमने अपने शिष्टाचार कहाँ से सीखा है? कुछ तो शिष्टता होनी ही चहिये। कम से कम एक गमछा या कुछ और धारण कर के अपनी माता से मिलने जाओ। मुझे ज्ञात है कि तुम्हे युद्ध में बुरा दिन देखना पड़ा हैं, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम सुध बुध त्याग दो।” फिर अब क्या होता है? दुर्योधन सोचने लगता है,” हां, यह सच में गलत है। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।” अपने मन में ऐसा कहकर वह अपने आप को देखता है। ” मैं अभी अपना गमछा धारण कर लेता हूँ। एक बार कृष्ण चले जाए, और जब मैं अपनी माता के समक्ष खड़ा हो इसे हटा दूँगा। तब सब कुछ ठीक रहेगा।” इसलिए वह अपनी माँ के पास जाता है। गांधारी कहती है, “पुत्र क्या तुम तैयार हो?” दुर्योधन कहता है,” हाँ।” वो अपनी आँखे खोलती है और उसे देखने लगती है। नीचे तक देखते हुए वह अंततः गमछा देखती है। अंत में दुर्योधन की जांघे शक्तिशाली नहीं हो पाती हैं क्योंकि वे ढकी हुई थी। गांधारी दुर्योधन से कहती है,” मैंने तुम्हे सरल सा निर्देश दिया था कि अपने वस्त्र खोल कर खड़े होना।” वो कहता है,” मैं कृष्ण से मिला।” गांधारी सोचने लगती है,” और सभी लोगों को छोड़ कर मेरे पुत्र को कृष्ण से ही क्यों मिलना पड़ा? इस रात्रि में, सभी पांडव अत्यधिक प्रसन्न होंगे और वे सोने भी चले गए होंगे। ये कृष्ण रात्रि में क्यों भ्रमण कर रहा है?” वो पूछती है,” कृष्ण ने तुम से क्या कहा?” वो कहता है, “कृष्ण ने मुझे कहा कि मुझे बस एक गमछा धारण कर लेना चाहिये क्योंकि निर्वस्त्र हो घूमना अनुचित है। माता, मैं उनसे सहमत था और अपने मन में कहा था कि मैं यह निर्देश याद रखूंगा और सही समय आते ही मैं अपने वस्त्र हटा दूँगा।”

परन्तु गांधारी ने अपनी हार स्वीकारते हुए अनुभव किया कि वह अपने पुत्रों के लिए कुछ भी योजना क्यों न बना ले कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। कृष्ण बड़ी ही सहजता और मुखरता के साथ उसे सीखाना चाह रहे थे कि,” गांधारी, तुम चाहे जो भी योजना बना लो अपने पुत्र के लिए, यह मेरी दृष्टि के अनुकूल नहीं है। इससे कोई सफलता नहीं मिलगी। तुम्हे केवल अन्यथा और परेशानी ही मिलेगी। परन्तु युद्ध के अंत तक भी गांधारी यह स्वीकार नहीं कर पाई। यद्यपि गांधारी एक भद्र स्त्री थी, यह बात भी महत्त्वपूर्ण है। अगर आप जीवन में सच में शांति चाहते हैं, आपको समझना होगा कि हमारा भगवान् के साथ अन्तरंग और प्राघाढ़ सम्बन्ध है। भागवत और जप करने का क्या अर्थ है अगर अंततः हमें उनसे शांति न मिले? इसका फिर यही अर्थ है कि कही कुछ गलत है। भागवत सिर्फ हवा में ऊपर ऊपर नहीं होनी चाहिये। उसे धरती पर, जमीन पर होना चाहिये। हमें उससे जीवन को कैसे शांतिप्रियता से जिया जाए सीखना चाहिये। भागवत को हमें शांत होने में सहायक होना चाहिये। हमें उससे सीखना चहिये कि हमारा भगवान् के साथ अन्तरंग सम्बन्ध है और हम भगवान् से दूर नहीं हैं। परन्तु स्वयं दूर हो जाते हैं। हम अपने गुरुदेव से दूर नहीं हैं। हम त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं, यही कारण हैं कि हम उनसे दूरी अनुभव करते हैं। यह किस चीज के त्याग की बात हो रही है?

6. अपनी इन्द्रियों का त्याग भगवान् की इन्द्रियों की तृप्ति के लिए: हमारे श्री कृष्ण और गुरुदेव के प्रति प्रेम की वास्तविक चुनौती तब दृश्य या प्रदर्शित होगी जब हम ऐसी सेवाएं करेंगे जिन्हें करने में हमारी रूचि नहीं होगी। महाराज ने मुझे कहा था, ” देवकी कीर्तन गाने में क्या आनंद है? तुम्हे कीर्तन पसंद है। अतः तुम गा रहे हो। इसमें त्याग कहाँ है? तुम रसोई में सेवा का प्रयास करो!” सभी जानते हैं कि मैं खाना बनाने में कुशल नहीं हूँ और यह कुछ ज्यादा बड़ा हो जाएगा क्योंकि सब मारे जायेंगे। परन्तु महाराज ने कहा,” यह तुम्हारा बहाना है। तथ्य तो है कि तुम वही सेवा करना पसंद करते हो जिसमें तुम रुचिकर होते हो। यह अहंकार ही हमारे भाग्य को स्वीकारने में सबसे बड़ा अवरोध है। अतः हमारा कृष्ण से सम्बन्ध का निर्धारण, हम कितना भगवान् को प्रसन्न करने के लिए तत्पर हैं, से होता है न कि हम कितनी अपनी इन्द्रियों की तृप्ति करते हैं। जो भी भगवान् की इन्द्रियों की तृप्ति के लिए प्रयास करते हैं उनकी इन्द्रियां स्वाभाविक ही तृप्त हो जायेंगी।.”

रावण ने इन्द्रियों की तृप्ति के लिए सब कुछ किया। परन्तु कमी किस चीज की थी? पूरी लंका २४ कैरेट सोने की थी। कल्पना कीजिये एक पूरी नगरी सोने की हो और विशेषतः वह भी आज के सोने के भाव की। कल्पना कीजिये कि पूरी लंका का मूल्य क्या होगा? और उस पर भी, कितनी धार्मिक व भद्र पत्नी, मंदोदरी। जब आप रामायण में मंदोदरी के गुणों के बारे में पढ़ते या देखते हैं, आप उसके गुणों के बारे में कई कई पृष्ठ भर सकते हैं। वह एक प्रथम श्रेणी की स्त्री थी। परन्तु रावण के लिए यह काफी न था। वह सीता जी को प्राप्त करना चाहता था, वह सीता जी को सबके नियंता, श्री राम के बिना चाहता था, बिना उनके, जिनकी सीताजी थी, जिन्हें सीताजी सौंपी गयी थी और जिसके साथ सीताजी ने अपने जीवन की शपथ ली थी। महाराज कहते हैं हमारा ओछापन भी ऐसा ही है। हम लक्ष्मी देवी को चाहते हैं। हम प्रार्थना करते हैं, “लक्ष्मी देवी! कृपा करें। धन की कमी है। काम काज अच्छा नहीं है। मुझे यह दे दीजिये। मुझे वह दे दीजिये।” लक्ष्मी सब कुछ प्रदान करती हैं, परन्तु प्राप्त करने पर हम यह भूल जाते है कि लक्ष्मी पति ही हैं वह जो हमें लक्ष्मी देवी तक जाने के लिए अधिकृत करते हैं। इसलिए हम कृष्ण की अनदेखी करते हैं और सोचते हैं कि हम उनसे जो उनका है उसे चुरा सकते हैं, ऐसा करने पर रावण के जैसा भाग्य ही हमारी प्रतीक्षा कर रहा होगा। अंततः रावण का निग्रह हो गया था। उसकी जो भी सपत्ति थी, सबका नाश हो गया था और उसका सिर्फ एक ही कारण था, वह उस पर आधिपत्य स्थापित करना चाहता था जो उसका था ही नहीं। अतः हम पूछ सकते हैं, हमें कैसे ज्ञात हो कि कौन सी वस्तु पर हमारा आधिपत्य नहीं हैं? यह भी बहुत सरल है, महाराज कहते हैं, “बस इस संसार में ऐसे जीयो कि किसी भी चीज पर तुम्हारा कोई आधिपत्य नहीं है क्योंकि हर वस्तु उधार में मिली है इसलिए हर वस्तु अपने आप आयेगी और चली भी जायेगी।” जब कभी भी हमें मंदिर के लिए धन एकत्र करने में परेशानी होती, मैं और वैष्णवसेवा प्रभु कितने व्याकुल एवं व्यग्र हो जाते थे। हम कितने ही भौतिक समाधान और अभिनव युक्तियाँ निकालते धन एकत्र करने के लिए। अंततः कोई भी अभिनव युक्ति हमें शांति नहीं देती। तब महाराज हमारे पास आकर बैठ जाते और कहते,” जैसा हम जानते हैं कि हमारे पास कुछ भी नहीं हैं। जब हम यहाँ आये थे यहाँ कोई मंदिर नहीं था, जैसा कि हम जानते हैं यहाँ आने पर यहाँ पर सिर्फ समतल धरती थी। अब अगर मंदिर नहीं होगा तो हम क्या खो देंगे?” जब मैं इन निर्देशों का स्मरण करता हूँ, मुझे ज्ञात होता है कि अगर मैं इनका अनुसरण जीवन के किसी भी क्षेत्र में करू, तत्काल ही हम किसी भी घबराहट से मुक्त हो सकेंगे। कल्पना करें हमें बहुत सा धन प्राप्त होता है और फिर उस धन की हानि हो जाती है, तब यह बात यहाँ कितनी उपयुक्त बैठती है। जैसा था वैसा ही रह गया, जब हमारा जन्म हुआ था, किसी की भी जेबें धन से भरी हुई नहीं थी। किसी की भी नहीं। कोई भी जन्म से pampers नहीं डाले हुए था। क्या ऐसा कोई बच्चा है जिसे हम जानते हो जो पूरे कपड़ों में जन्मा था? क्या कोई बच्चा जन्मा है जिसके पास जन्म के साथ ही जन्म का प्रमाणपत्र पर लिखा मिले कि मैं पहले एक MBA हुआ करता था। कोई भी नहीं। किसी भी बच्चे का जन्म हँसते हुए नहीं हुआ है। यह अस्वाभाविक है और महाराज कहते हैं कि जब बच्चा रोते रोते बाहर आता है, हम हरीबोल! कहते हैं। वह बच्चा कह रहा होता है, ” मुझे यहाँ आना बिलकुल नापसंद है और मेरे भोले माता पिता मेरे इस भयंकर जगत में मेरा स्वागत कर रहे हैं। यह सभ्यता बिलकुल उल्टी है।”

यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि हम ऋषिकेश की इन्द्रियों की तृप्ति करना सीख जाए और यही एकमात्र उपाय है हमारे शांत होने का।

प्रभुजी ने हमें उदाहरण दिया कि कैसे जटायु और हनुमानजी ने सभी प्रकार के प्रयासों से भगवान् की इन्द्रियों की सेवा की थी और उसी कारण वे शांति अनुभव कर पाए थे। आने वाले लेख में कृष्ण कृपा होने पर उसी की प्रस्तुति की जाएगी।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की सेवा में रत
वैजयंती माला देवी दासी,
चेन्नई।