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भाग्य को स्वीकारे भाग – 6

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

इसके पूर्व की प्रस्तुति में हमने देखा कि प्रभुजी ने इन बातों की विवेचना की है -

  1. हमारे हाथों में कुछ भी नहीं हैं सब कुछ भगवान् के हाथों में हैं। इसलिए भाग्य हमारे नियंत्रण में नहीं है।
  2. हम बहुत सी योजनायें बनाते हैं। अतः कृष्ण की योजना को कैसे जाना जाये? प्रभुजी ने बताया कि इसकी शुरुआत यह स्वीकारने मात्र से हो जाती है कि हमें उनकी योजना ज्ञात नहीं है।
  3. अब अगला प्रश्न है कि कृष्ण की योजना को कैसे स्वीकारा जाए और इसकी शुरुआत यह मान लेने से हो जाती है कि हमें वह चीज नहीं चाहिये जो कृष्ण हमारे लिए नहीं चाहते हैं।
  4. उनकी योजना को स्वीकारने के पश्चात उनका निष्पादन कैसे किया जाए? यहाँ प्रभुजी ने बताया कि उसे श्रद्धापूर्वक और ईर्ष्या रहित भाव से करना होगा।
  5. भगवान् की इच्छाओं का निर्विवाद अनुगमन करने के परिणाम में हम भाग्य से मुक्त हो जाते हैं। प्रभुजी ने जयद्रथ वध की कथा और गांधारी एवं दुर्योधन की एक कथा सुनाई जिसके द्वारा श्री कृष्ण ने भीम की रक्षा की थी।

भगवान् की इन्द्रियों की प्रसन्नता में की जाने वाली सेवा में हमारी तत्परता हमारे श्री कृष्ण के साथ सम्बन्ध की परिचायक होती है। इसी संदर्भ में प्रभुजी ने जटायु और हनुमानजी की कथा सुनाई, नीचे उसी को लिपिबद्ध किया गया है।

6.स्वं की इन्द्रिय तृप्ति का त्याग भगवान् की इन्द्रियों की सेवा के लिए: जटायु अपने जीवन के अंतिम क्षणों को जी रहा था। वह गिद्धों का सेवामुक्त वृद्ध राजा था और उसकी सारी शक्ति क्षीण हो चुकी थी। परन्तु जब उसने रावण को भगवान् श्री राम के द्वारा अधिकृत सीता माता को ले जाते देखा, उसने अपनी इन्द्रियों या शरीर की परवाह नहीं की। उसने अपने दर्द, पीड़ा, वृद्ध आयु और अक्षमताओं पर विजय पाकर रावण को चुनौती दी कि वह श्री राम के द्वारा निति पूर्वक अधिकृत वस्तु उन्हें लौटा दे। परन्तु इस साहसिक कारनामे का क्या परिणाम हुआ? उसका वध कर दिया गया। उसके पंख कट गए थे और वह रक्त बहाता हुआ नीचे आ गिरा। जब राम और लक्ष्मण आये और उन्होंने पक्षी को देखा, उन्होंने सोचा कि वो रावण है या फिर रावण का ही कोई योद्धा होगा। फिर जब उन्होंने उसे जटायु के रूप में पहचाना, जटायु ने उन्हें सारा विवरण सुना दिया, “हे राम, मैंने भरसक प्रयास किया, परन्तु मेरे स्वामी, मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं अपने प्रयासों में विफल हुआ। मैंने सीता माता की रक्षा करने का प्रयास किया परन्तु मैं उनकी रक्षा नहीं कर पाया। मुझे बड़ा खेद हो रहा है कि मैं विफल हुआ।” रामायण में भगवान् राम कहते हैं, “वास्तव में तुम्हारी जीत हुई है। तुम्हारी विजय इसलिए हुई है क्योंकि वह प्रयासों के परिणाम नहीं है जिनकी मुझे परवाह है। यह तुम्हारे सुन्दर प्रयास है जिनकी मुझे परवाह है। तुम अपनी स्थिति से असक्षम थे परन्तु अपनी अक्षमताओं के साथ भी तुमने मेरी सेवा की और श्रेष्ठ प्रयास किये। यही एक भक्त होने की योग्यता है। एक भक्त की वास्तविक प्रकृति यही है कि वह अपने कष्टों की चिंता नहीं करता अपितु उसकी सारी चिंता यही होती है कि वह किस प्रकार भगवान् और उनके भक्तों को प्रसन्न कर सकता है। ” ऐसे व्यक्ति के लिए कृष्ण द्वारा निर्धारित नियति ही उसकी नियति बन जाती है। ऐसे व्यक्ति के पास हैरानी, परेशानी, व्याकुलता सिर्फ क्षणिक रूप में आती है। वे उन्हें सिर्फ कुछ क्षणों के लिए स्पर्श कर सकती है परन्तु वह उस स्थिति में भी जटायु की तरह ही तत्परता से, निरंतर, बिना किसी परोक्ष प्रेरणा के सेवा करता रहता है( अहैतुकी अप्रतिहता)। जटायु की सेवा के पीछे कोई स्वार्थ भरी प्रेरणा नहीं है। उसकी प्रेरणा क्या थी? क्या उसे कोई उपाधि मिलने वाली थी? उसे इससे क्या प्राप्त होने वाला था? कुछ भी नहीं। वह ऐसे भी मरने वाला था। परन्तु उसने ऐसा सिर्फ भगवान् की सेवा हेतु किया और क्योंकि उसकी और कोई दूसरी प्रेरणा नहीं थी, उसकी सेवा का परिणाम भी निरंतर उसे मिलता रहा। क्यों? क्योंकि अंततः उसकी नियति भगवान् श्री राम के हाथों में थी। भगवान् राम जटायु से कहते हैं, ” आज मैं तुम्हारा अंतिम संस्कार करूंगा। मैं इसे उसी प्रकार करूंगा जिस प्रकार से एक पुत्र पिता के लिए करता है।” कहाँ किसी के ऐसे भाग्य होंगे कि भगवान् स्वयं हमारा अंतिम संस्कार करें और यह भाग्य एक पक्षी को प्राप्त हुआ। जब उन्होंने सारे अंतिम संस्कार किये, एक प्रिय पुत्र की तरह, भगवान् राम, लक्ष्मण को कहते हैं, “मेरे प्रिय भाई, आज का दिन मेरे जीवन में बड़ा ही दुखद है, इसलिए नहीं क्योंकि सीता माता चली गयी हैं अपितु इसलिए क्योंकि आज जटायु मारा गया है। मेरे परम प्रिय भक्त जटायु ने मेरी बहुत ही अनुपम सेवा की है। उसकी मृत्यु की पीड़ा मुझे सीता के वियोग से मिली पीड़ा से अधिक है।” महाराज अतः कहते हैं भगवान् की महानता ऐसी है और ऐसी ही महानता है उनके भक्तों की

हनुमानजी एक दूसरे अनुपम उदाहरण हैं। क्योंकि हनुमानजी केवल भगवान् श्री राम की इन्द्रियों की तृप्ति के लिए सेवा करने में प्रयास रत थे, उनकी इन्द्रियाँ स्वतः ही बिना प्रयास के तृप्त हो जाती थी। उनके द्वारा कही गयी बातों का पालन कर के, आप केवल कृष्ण को प्रसन्न करने का प्रयास करें।

  1. चारों नियमों का पालन करें।
  2. अपना जाप अच्छी तरह से करें।
  3. नित्य प्रतिदिन भागवत पढ़ें।
  4. भक्तों के साथ प्रेमपूर्वक सद्व्यवहार करें।
  5. भौतिक जगत के आक्रमणों के प्रति सहिष्णु रहे।
  6. सदा विनीत रहे।

अगर हम इनका अनुसरण करें तो स्वतः ही हमारी इन्द्रियाँ व्याकुल नहीं होंगी। अगर सेवा करने में हम कुछ कष्ट भी सहे तो उससे क्या होगा? महाराज कहते थे कि तबियत ठीक न होने पर भी कम से कम मंगल आरती के लिए आओ। ज्यादा से ज्यादा बुरा क्या हो सकता है? तुम्हरी मृत्यु हो जाएगी। अगर मंगल आरती के समय तुम्हारी मृत्यु होगी, यह फिर भी मंगल है, – शुभ है। जैसे सब जानते हैं, एक दिन मरना ही है। बेहतर होगा कि मंगल आरती के समय मृत्यु आये किसी और समय आने की जगह। तर्क को देखिये। कौन ऐसे तर्क को अस्वीकार सकता है? इसलिए जब कोई आपको कहे, ” प्रभु, मैं बहुत थका हुआ था, बीमार था।” तब मुझे महाराज की इस बात का स्मरण होता है, “तब फिर आप मंगल आरती के लिए आये। अपनी तबियत और बुरी कर ले क्योंकि कृष्ण के लिए रोग सहन करना अपने लिए रोगों को सहन करने से कही ज्यादा बेहतर है।”

हनुमानजी की वृत्ति भगवान् श्री राम पर स्थित थी। सीता माता और लक्ष्मण जी चिंतित थे कि उन्हें भगवान् की सेवा करने का कोई अवसर नहीं मिलेगा क्योंकि हनुमानजी सारी सेवा कर दिया करते थे। सीता माता कहती हैं, ” रात्रि में जब मैं सोयी रहती हूँ, उस समय भी वे कही न कही घर के किसी कोने में राम नाम का जप करते रहते हैं। मुझे अपने पति के साथ कोई व्यक्तिगत समय मिलता ही नहीं।” अतः उन्होंने ऐसा किया कि एक सेवा करने वालों की सूचि बना ली। उन्होंने सभी सेवाओं के लिए नियुक्तियां की लेकिन ध्यान रखा कि उसमें सब का नाम हो लकिन हनुमानजी का नाम न हो। तब उन्होंने उस सेवा की सूचि को भगवान् द्वारा पारित भी करवा लिया।

तब हनुमानजी आये और उन्होंने सूचना पट्टी को देखा। उनके लिए कोई भी सेवा नहीं रखी गयी थी। इसलिए वे रामजी की सभा में गए और उनसे जाकर बात की। सीता माता और लक्ष्मण जी थोड़े उत्सुक हो रहे थे कि वे अपनी सेवाएं बिना हनुमानजी के हस्तक्षेप के कर पायें। हनुमानजी कहते हैं, ” मेरे लिए कोई सेवा नहीं रखी गयी है।” भगवान् राम कहते हैं, “ठीक ही तो है। समस्या क्या है?” तब हनुमानजी कहते हैं, ” मैं आपकी सेवा के बिना जीवित नहीं रह सकता।” तब भगवान् राम कहते हैं, ” क्योंकि तुम इतने निश्छल हो, तुम्हारे श्रेष्ठ स्वामी तुम्हे कोई न कोई सेवा करने की सद्बुद्धि किसी न किसी तरह दे ही देंगे।” तब हनुमानजी कहते हैं, “आप ही मेरे स्वामी हैं। आप किस श्रेष्ठ स्वामी की बात कर रहे हैं?” इसलिए हनुमानजी भगवान् राम के पास नीचे जाकर बैठ गए। हर सेवा सभी के द्वारा सुचारू रूप से की जा रही थी। सभा के अंत में, भगवान् राम ने जम्हाई ली। जब उन्होंने जम्हाई ली तो उन्होंने बहुत बड़ा सा मुख खोला। जैसे ही उन्होंने अपना मुख खोला, तुरंत इससे पहले कोई वहाँ पहुँच पाता या सोच पाता कि यह यह सेवा सूचि पत्र पर नहीं थी, हनुमान जी कूद कर पहुँच गए और रामजी के मुख के आगे उँगलियों से चुटकी बजाई। और वे बड़े संतुष्ट हो गए। यह एक आम प्रथा है कि जब कोई जम्हाई ले तो उसके मुख के सामने चुटकी बजाई जाती है। लक्ष्मण और सीता माता को इसके परिणाम का कोई अनदेशा न था। जब तक भगवान् राम ने यह कहा,” मैं अपने कक्ष में जा रहा हूँ”, हनुमानजी उठ खड़े हुए। सीता माता कहती हैं, ” तुम उनके पीछे पीछे क्यों आ रहे हो। मैं उनकी पत्नी हूँ। मैं कक्ष में प्रवेश कर रही हूँ। तुम क्यों प्रवेश कर रहे हो?” हनुमानजी कहते हैं, ” क्या आपको पता है कि भगवान् कब जम्हाई लेंगे? ” सीता माता कहती हैं, ” हम यह कैसे जान सकते हैं? यह तो किसी भी क्षण हो सकता हैं?” हनुमानजी कहते हैं, ” मेरा मत भी बिलकुल यही है। माता, क्योंकि हम नही जानते कि वे किस समय जम्हाई लेंगे, मुझे २४ घंटों उनके साथ रहना होगा, ताकि जिस क्षण वे जम्हाई ले मुझे चुटकी बजाने के लिए तैयार रहना होगा। इस कारण मुझे भगवान् के आस पास रहना होगा। मैं भगवान् के बहुत निकट रहूँगा और अपनी सेवा करता रहूँगा।” महाराज कहते हैं कि सीता माता तो मुर्छित ही हो गई और लक्ष्मण जी बुरी तरह निराश हो गए।

परन्तु इससे एक चीज ज्ञात होती है कि अगर आप वास्तव में, वास्तव में अपने भाग्य को स्वीकारने में शांति चाहते हैं, तब ऋषिकेश की इन्द्रियों की तृप्ति के लिए प्रयास करें और उत्साहपूर्वक ऐसा करने से, भगवान् किसी न किसी विधि से आपको अपनी सेवा में मग्न रखने का प्रबंध कर देंगे। कृष्ण किसी को कभी निराश नहीं करते। केवल हमें श्रद्धा की आवश्यकता हैं। अगर आप कहे, “कृष्ण कृपया मुझे अपनी सेवा में ले लीजिये और मैं इसके लिए अपना पसीना बहाने के लिए तैयार हूँ।”, वे तुम्हे सेवा क्यों नहीं देंगे और यही समझने वाली बात है। भगवान् की सुरक्षा के अंतर्गत ही उनका दिशा निर्देश भी आता है। महाराज कहते हैं कि बात बस इतनी सी ही है। जब भगवान् आपकी रक्षा करते हैं तो वे आपको दिशा निर्देश भी देते हैं। जब भगवान् ने अर्जुन की रक्षा की थी, उन्होंने वास्तव में अर्जुन का दिशा निर्देश सेनाओं के मध्य में किया था और जब आपका दिशा निर्देश हो रहा हो तो आप स्वाभाविक ही सुरक्षित भी रहेंगे।

प्रभुजी ने आगे और भी समझाया कि जब तक हम हर घटना के पीछे कृष्ण के हाथ नहीं देखेंगे तब तक हम भगवान् द्वारा निर्धारित भाग्य को अपने भाग्य के रूप में स्वीकार नहीं सकेंगे। आने वाले लेख में कृष्ण कृपा होने पर इसी को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया जायेगा।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की सेवा में रत
वैजयंती माला देवी दासी,
चेन्नई।