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भाग्य को स्वीकारे भाग – 7

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

यह लेख हमारे प्रिय गुरु भाई परम पूज्य देवकीनंदन प्रभुजी के द्वारा गत २७ मई २०११ को चेन्नई में श्रीमद्भागवत के श्लोक संख्या ७.२.४० पर दिए गए प्रवचन को लिपिबद्ध करने के प्रयास की अंतिम कड़ी है।

7. हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथ देखें: श्रीमद्भागवत के श्लोक संख्या ७.२.४० का निष्कर्ष बहुत ही सुन्दर है। जब तक हम हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथ नहीं देखेंगे तब तक हम भगवान् के द्वारा दिए भाग्य को हम अपने भाग्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएंगे। जब प्रतिकूल स्थिति हो, मुसीबतें आयें तब हमें व्याकुल नहीं होना चहिये। हम कुछ क्षणों के लिए परेशान हो सकते हैं लेकिन यह सब हमारी साधना और श्रद्धा पर निर्भर करता है। जब आपकी साधना और श्रद्धा अच्छी होगी और साधु संग होगा, हमारी निराशा शुरू होने से लेकर हमारी उससे उत्पन्न हुई उत्कंठा से बाहर निकल जाने के बीच की अवधि, छोटी, छोटी और छोटी तब तक होती जाती है जब तक वह अवधि २ मिनट से भी घट कर इतनी कम न हो जाए कि हम अपनी चेतना को पुनर्प्राप्त कर यह कह सकें,” कृष्ण, मैं आपके हाथ देखने का प्रयास कर रहा हूँ “। ऐसा कर के आप शांति अनुभव करते हैं। वरना इसमें कई दिन व महीनें भी निकल सकते है जब हम भगवान् के हाथ देख पाने में सफल हो पाए क्योंकि भगवान् रहस्यमय रूप से काम करते हैं, हमें उनके हाथ नजर नहीं आयेंगे। महाराज कहते हैं कि कभी कभी इसमें कई कई जन्म भी बीत सकतें हैं। हम देख नहीं पाएंगे। परन्तु जो इसे स्वीकारते हैं, वे उन्हें दृश्य होतें हैं, कृष्ण उन्हें अन्तर्निहित, उनके प्रयोजन को समझने की दृष्टी प्रदान करते हैं। इसलिए अगर आपने हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथों को देखना स्वीकार लिया हैं, तब हमारे लिए सब कुछ सुलभ होगा। चैतन्य चरितामृत,आदि लीला १४.१ में अत्युत्तम श्लोक है

कथंचना स्मृते यस्मिन: दुष्कर्म सुकर्म भवेत्। 
विस्मृते विपरीतं स्यात: श्री चैतन्यम नमामि तम।।

वे कार्य जो कष्टसाध्य होते हैं, वे चैतन्य महाप्रभु के किसी न किसी रूप में किये गए स्मरण मात्र से आसानी से संपन्न हो जाते हैं। परन्तु अगर कोई उनका स्मरण नहीं करता है तब आसानी से सिद्ध होने वाला कार्य भी दुष्कर हो जाता है। ऐसे भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु को मैं ससम्म्मान प्रणाम करता हूँ।

कृष्ण के हाथों को स्वीकारने की यही विधि है और जो कोई इसे स्वीकारता है, महाराज कहते हैं उसका कृष्ण के साथ अन्तरंग सम्बन्ध ही उसके जीवन में शांति के रूप में परिणत होगा। कृष्ण से संबंध स्थापित करने का यही मार्ग है और जब तक यह संबंध स्थापित नहीं होगा हमें शांति नहीं मिल सकेगी। कृष्ण भगवद्गीता के श्लोक२.६ में कहते हैं -

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। 
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखमन।।

जो कृष्णभावनामृत में परमेश्वर से सम्बंधित नहीं हैं उसकी न तो बुद्धि दिव्य होती है न ही मन स्थिर होता है जिसके बिना शांति की कोई सम्भावना नहीं है। शांति के बिना सुख हो भी कैसे सकता है?

अगर हम कृष्ण द्वारा निर्धारित नियति को अस्वीकार कर के उनसे जुड़े हुए नहीं हैं तो हमें दिव्य ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता हैं। महाराज कहते हैं, “आप भगवद्गीता मुख्य पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक पढ़ सकते हैं, आपको सभी श्लोक कंठस्थ हो सकते हैं, आप चलती फिरती भागवत हो सकते हैं परन्तु अगर आप कृष्ण से नहीं जुड़े हुए हैं, उन्हें स्वीकार नहीं करते हैं तो सारा दिव्य विवेक गायब हो जायेगा और आपकी मति अस्थिर हो जायेगी। आप व्यग्र हो जायेंगे। इसमें भागवत का कोई दोष नहीं। हम भागवत को अस्वीकार कर रहे हैं। अंतर बस यही है।” और तब फिर शांति की कोई संभावना ही नहीं होती। जब शांति ही नहीं होगी तो सुख कहाँ से होगा? यह एक प्रश्न से अंत होता है। इस श्रेष्ठ तथ्य का यही निष्कर्ष है। कृपया हर होनी के पीछे कृष्ण के हाथों का दर्शन करें। कृपया याद रखें कृष्ण योगेश्वर हैं, अगर वे चाहे तो वे आसानी से दिन को रात्रि में परिणत कर सकते हैं। इसलिए हमें अपने गुरुदेव की आज्ञा का पालन करना चाहिये क्योंकि हमारे गुरुदेव ही हमारा जीवन है, हमारी आत्मा है।

8.गुरुदेव के प्रति आज्ञाकारिता: गुरुदेव के द्वारा दिए गए निर्देश हमारे ह्रदय(तप्त जीवनं) के संतापों को हर लेते हैं, और यह सौ प्रतिशत होता ही है। मैंने महाराज से पूछा,” महाराज मुझे आपकी आज्ञाओं का कैसे पालन करना चाहिये?” उन्होंने उत्तर दिया,”अगर तुम श्वास लेना चाहते हो, तो मेरी आज्ञा लो, और फिर श्वास लो। तुम इस हद तक आज्ञाकारी हो सकते हो। तब तुम चिंता नहीं करो कि तुम कहाँ जा रहे हो। तुम जहाँ भी जा रहे हो, मैं तुम्हे ढूंढ़ लूँगा और कृष्ण के पास पुनः खड़ा कर दूंगा।” इसी कारण महाराज अपने एक प्रसिद्ध कथन में कहते हैं, “आज्ञाकारिता कृष्ण के प्रति सर्वोच्च स्मरण की विधि है।” यह एक गहन तथ्य है।

आज्ञाकारिता पर एक सुन्दर कथा है जो महाराज ने मुझे सुनाई थी और वह महाभारत से ली गयी है। आप जानते ही हैं कि देवतागण और असुरगण सदैव लड़ते ही रहते हैं। असुरों के गुरु शुक्राचार्य थे। बृहस्पति दूसरी पक्ष की तरफ थे। किसी कारणवश असुरगण अपने गुरु के प्रति ज्यादा समर्पित थे और इसी समर्पण के कारण वे वास्तविकता में युद्धभूमि पर देवताओं से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे। क्योंकि इन्द्र सदा की तरह अपने स्वर्गलोक के स्वाभाव में ही बृहस्पति का अनादर कर रहा था। परन्तु एक दिन ऐसा आया जब देवगण बड़ी मुसीबत में थे और उन्हें अपने गुप्तचरों से पता चला कि किस कारण असुर हर आक्रमण व चोट के बाद भी उठ खड़े हो जाते थे। उनके पास एक मन्त्र की शक्ति थी और वह मन्त्र था अमृत संजीवनी। यह मन्त्र शुक्राचार्य के पास था। बृहस्पति ने निर्णय लिया किसी को जाकर उसे वह मन्त्र प्राप्त करना ही होगा।

अतः बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को कह बुलाया और फिर उसे पूछा, ” कच, क्या तुम इसके लिए तैयार हो?” कच बहुत ही आज्ञाकारी था। कच ने उत्तर दिया, ” पिताजी, आप जो भी कहेंगे मैं उसका पालन करूंगा। मैं वहाँ जाऊँगा और मंत्र लेकर आना ही मेरा लक्ष्य होगा। कृपया मेरे लिए प्रार्थना कीजियेगा कि मैं अपनी सेवा पथ से विचलित न हो पाऊ।” इसलिए कच दूसरे पक्ष की तरफ चला गया। उसने शुक्राचार्य को प्रणाम करते हुए कहा, ” मैं आपसे सभी विद्याएँ सीखना चाहता हूँ।” शुक्राचार्य ने मन ही मन सोचा, ” तुम अपने आप को बहुत बुद्धिमान समझते हो। मुझे ज्ञात है कि तुम यहाँ क्यों आये हो। तुम्हे अमृत संजीवनी चाहिये। परन्तु वो अंतिम विद्या होगी जो मैं तुम्हे सिखाऊँगा।” तब उन्होंने कच से कहा, ” ठीक है। अपनी उदारता के कारण, हालाकि तुम विपक्षियों की ओर से हो, आओ पुत्र, मेरे आश्रम में रहो। मैं तुम्हे वे सभी विद्याएँ सिखाऊँगा जो तुम्हारे पिता को नहीं आती हैं।” इस प्रकार कई महीनें और वर्ष बीत गए।

शुक्राचार्य की एक पुत्री थी देव्यानी। उसे कच से प्रेम हो गया। उसने निर्णय कर लिया कि वह कच से ही विवाह करेगी। असुरगण यह सब देख रहे थे और अब वे थोड़े घबराने लगे। हमारे मध्य में शत्रु है और अब हम उसे यहाँ और ज्यादा समय तक नहीं रहने दे सकते। उन्होंने उसके वध की योजना बनाई। एक दिन जब कच गायों को चरा रहा था, उन्होंने उस पर आक्रमण कर दिया, उन्होंने उसके टुकड़े टुकड़े कर के हर दिशा में फेंक दिए। तब यह सोचते हुए कि सब कुछ ठीक है वे वहाँ से चले गए। संध्या में देव्यानी कच की प्रतीक्षा कर रही थी और उसे वहाँ न पाकर वह अपने पिता के पास जाकर उन्हें कहने लगी, ” पिताजी, मुझे लगता है कुछ तो हुआ है। कृपया अमृत संजीवनी का प्रयोग करें और उसे वापस ले आये।” शुक्राचार्य ने कहा, ‘ क्यों? वह और लड़कों जैसे ही एक लड़का है।” परन्तु अब देव्यानी ने अपने ह्रदय की बात उनके सामने खोल कर रख दी, ” मुझे वो पसंद है, और मैं उससे विवाह करना चाहती हूँ। अतः आप कृपया उसे पुनः जीवित कर दे।” इसलिए अपनी पुत्री को प्रसन्न करने के लिए शुक्राचार्य ने वे मन्त्र उच्चारे और अचानक से कच प्रकट हो गया। उसने कहा,” हे गुरुदेव, आप मुझे आठों दिशाओं से पुनः कैसे लेकर आये?” शुक्राचार्य कहते हैं, ” तुम्हे मन्त्र नहीं मिलने वाला।” असुर चिंतित थे। उन्होंने दोबारा फिर से आक्रमण किया। इस बार वे उसे नितांत दूरस्थ स्थान पर ले गए और वहाँ जाकर उसका वध कर दिया। उन्होंने उसके शरीर को ओखली में पीस डाला, उसका चूर्ण बनाया और उस चूर्ण को महासागर में डाल दिया। ऐसा कर के उन्होंने सोचा कि अब कार्य पूरा हो गया है।

पुनः देव्यानी उसे वापस चाहती थी। जब उसके पिता ने मंत्र उच्चारने से मना कर दिया तब वह कहने लगी, “पिताजी मैं उसके वियोग में मर जाऊंगी।” अमृत संजीवनी का उच्चारण किया जाता है और कच पुनः लौट आता है। कच कहता है, ” अब कृपया मुझे बता दे कि यह कैसे किया जाता है?” शुक्राचार्य कहते हैं, “नहीं। मैं यह मन्त्र तुम्हे नहीं बता रहा। मेरी निष्ठा असुरों के साथ है।” कच हताश नहीं हुआ। उसने आज्ञाकारिता की शक्ति और प्रभाव का स्मरण किया – आज्ञाकारिता में बहुत बल है। अब असुर बुरी तरह चिढ चुके थे। उन्होंने एक उपाय सोचा जिससे मन्त्र का प्रयोग संभव नहीं हो पाए। उन्होंने उसका वध कर दिया। उसके शरीर के टुकड़े किये, पीस कर चूर्ण बनाया और फिर मदिरा के पात्र में उस चूर्ण को मदिरा में घोल दिया। फिर आश्रम में वे शुक्राचार्य से मिलने गए। शुक्राचार्य की एक कमजोरी थी। उन्हें मदिरा बहुत प्रिय थी। उन्होंने शुक्राचार्य से जाकर कहा कि वे उनके लिए बहुत अच्छी मदिरा लाये हैं। शुक्राचार्य ने वही मदिरा पात्र उठाया जिसमे कच का चूर्ण डाला गया था।

देव्यानी पुनः संध्या में उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वह फिर से अपने पिता के पास गयी और कहने लगी, ” पिताजी आपको उसे फिर से लाना ही होगा। मैं बहुत चिंतित हूँ। शुक्राचार्य को एहसास हो गया था कि यहाँ थोड़ी सी गड़बड़ी है। वे कहने लगे, “प्रिय पुत्री, कच किसी दूरस्थ समुद्र में नहीं है। वह किन्ही दिशाओं में भी नहीं है। वह मेरे उदर में है। उसके बाहर आने पर मेरी ही मृत्यु हो जायेगी। अतः तुम किसे चाहती हो? तुम पिता चाहती हो या पति? चुनाव तुम्हें करना है।” देव्यानी बोली, “यह चुनाव मैं नहीं कर सकती। मुझे तो दोनों चाहिये।” अब यह कैसे हो सकता था?

कच उनके उदर से कहने लगा। वो कहता है, “शुक्राचार्य, मेरे पास एक सुझाव है। अपितु आपके पास और कोई विकल्प भी नहीं है। अगर आप जीवित रहना चाहते है तो आपको प्रथम मुझे अमृत संजीवनी सिखानी होगी क्योंकि जब आप पहली बार अमृत संजीवनी का प्रयोग करेंगे तब मैं बाहर आऊंगा परन्तु आपकी मृत्यु हो जाएगी, तब मैं अमृत संजीवनी का प्रयोग कर के आप को पुनः जीवित करूंगा।” शुक्राचार्य ने बहुत बहुत सोचा और फिर कहा, ” इसने मुझे सच में विवश कर दिया है। अब मुझे इसे अमृत संजीवनी सिखानी ही होगी।” तब उन्होंने मंत्र का उच्चारण किया और कच उनके उदर को चीरते हुए बाहर निकल आया। शुक्राचार्य की मृत्यु हो गयी। देव्यानी ने कहा, ” कृपया मेरे पिता को जीवित कर दो।” कच मधुर स्वाभाव का था। वह किसी को भी दुःख नहीं देना चाहता था। वह केवल अमृत संजीवनी प्राप्त करना चाहता था। जो उसे प्राप्त हो चुकी थी अतः उसने मन्त्र का उच्चारण किया। वैसे यह एक अच्छा अभ्यास था उस मन्त्र को परखने का, वह काम भी करता है भी कि नहीं। उसने प्रयास किया और वह सफल हुआ। शुक्राचार्य सजीव खड़े हो गए और उनके पास कोई विकल्प भी नहीं बचा था। अनिच्छापूर्वक उन्होंने कच को आशीर्वाद देते हुए कहा, ” मुझे नहीं पता कि तुमने यह गुण कहाँ से सीखा, परन्तु तुम्हारे अपने पिता एवं गुरु के प्रति आज्ञाकारिता के गुण की शक्ति के कारण तुमने इस मन्त्र को वास्तविकता से प्राप्त कर लिया है जिसे बड़े बड़े देवता गण भी नहीं सीख पाते है।” महाराज ने अंत में कहा, “कच की तरह बनो। धीर बनो। भक्तिभाव से सेवा करो लेकिन उसे श्री भगवान् के प्रति, अपने अग्रजों के प्रति और अपने गुरुदेव के प्रति आज्ञाकारिता के मंच पर करो। इस तरह से,अंत में सिर्फ एक ही चीज तुम्हारा अभिवादन करेगी और वह सफ़लत होगी।

अतः अगर आप वास्तव में अपनी भक्तिभाव से की गई सेवा में सफल होना चाहते है, अगर आप सच में भगवान् कृष्ण के हाथ को हर होनी में देखना चाहते हैं, अगर आप भगवान् द्वारा प्रदान की गई नियति को स्वीकारना चाहते है, हमें भागवत में दी गयी इस अत्युत्तम बात का सदैव स्मरण रखना चाहिये और हर होनी में कृष्ण के हाथों का दर्शन करना चाहिये। दूसरों पर दोषारोपण करने कि बजाय अपने आपको देखना चाहिये। ऐसा करने से हमें अत्यंत शांति मिलेगी और हम कभी व्यग्रता, व्याकुलता या उत्कंठा नहीं सताएगी।

हम परम पूज्य देवकीनंदन प्रभुजी को इन मूल्यवान प्रवचनों के लिए अपना हार्दिक धन्यवाद देते हैं।

बहुत बहुत धन्यवाद,
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरुदेव की सेवा में रत आपकी,
वैजयंती माला देवी दासी,
चेन्नई।

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