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एकाग्र चित्त वृत्ति

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया
प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

श्रील प्रभुपाद कहते हैं, “ अगर परम सत्य की अनुभूति जीवन का चरम लक्ष्य है, तब उसे प्रत्येक संभव तरीके से करना होगा“, “प्रत्येक संभव तरीके” अत्यधिक ध्यान देने योग्य शब्द हैं। परन्तु यह कैसे किया जा सकता हैं? चलिए देखते हैं।

मानव समाज संपूर्ण विश्व में चार जातियों और चार जीवन के चरणों (आश्रमों) में विभाजित है। चार जातियाँ हैं बुद्धिमान जाति (ब्राह्मण), योद्धा जाति (क्षत्रिय), उत्पादक जाति (वैश्य) और श्रमिक जाति (शुद्र)। इन जातियों का विभाजन मनुष्य के कार्य और उसकी योग्यता के अनुरूप किया गया है, जन्म के अनुसार नहीं। फिर जीवन काल के चार चरण क्रमवत इस प्रकार है, छात्र जीवन (ब्रह्मचर्य), घर का संचालक (गृहस्थ), अवकाश प्राप्त (वानप्रस्थ) और त्याग पूर्ण (संन्यास)। समाज के उचित हित के लिए जीवन के ऐसे विभाजन होने चाहिये, वरना कोई भी सामाजिक संस्थान स्वस्थ रूप से प्रगति नहीं कर सकती है, और प्रत्येक ऊपर दिए गए जीवन के विभाजनों में परम नियंता सर्वेश्वर भगवान् को प्रसन्न करना ही लक्ष्य होना चाहिये। कोई भी जाति किसी दूसरी जाति से ऊँची या नीची नहीं होती, जीवन के वर्णाश्रमों में भी यह लागू है।

हम अगर ध्यानपूर्वक जाँचे तो पाएंगे कि प्रत्येक जाति या आश्रम में श्रवण, वंदन, स्मरण, पूजन करना समान रूप में किया जाने वाले कार्य हैं। हम किसी ना किसी से कुछ न या तो सुनते हैं, या किसी का गुणगान करते हैं, या किसी का स्मरण और किसी ना किसी की पूजा भी करते हैं। जैसा कि साधारणतया जागतिक वार्ता में लगे लोग निरंतर ही फिल्मों, गानों, समाचार, खेल, अभिनेताओं, परिवार इत्यादि के बारे में सुनते रहते हैं। वे अभिनेताओं, खिलाड़ियों, नृत्य कलाकारों, अपने बच्चों, किसी बुनियादी सुविधाओं, कुछ प्रक्रियाओं, देशों, या फिर किसी और भौतिक वस्तु का गुणगान करते रहते हैं। लोग सदैव कुछ लोगों को उनके अच्छे या बुरे कर्मों के कारण याद करते हैं। वे अपना भूतकाल याद करते हैं। वे याद करते हैं कि वे कौन कौन सी जगहों पर गये थे और वहाँ उन्होंने कैसा अच्छा समय व्यतीत किया था। वे अपनी छुट्टियाँ याद करते हैं। नौजवान वर्ग अपना बचपन याद करते हैं। वृद्धावय लोग अपना यौवन काल याद करते हैं और फिर मृत्यु शैया पर अपने अधूरे रह गए कार्यों को याद करते हैं। स्मरण शक्ति का ऐसा प्रभाव होता हैं। और पूजा करने के बारे में तो कहे ही क्या। लोग अभिनेताओं, खिलाड़ियों की इस हद तक पूजा करते हैं कि मायावादी लोग उनके मंदिर तक बनाने का साहस कर रहे हैं। लोग देश की पूजा करते हैं। लोग अपने boss की पूजा करते है ताकि उन्हें पदोन्नति मिल सकें। लोग राजनेताओं की पूजा करते हैं ताकि उनके अपने काम पूरे हो सकें। वे राष्ट्र नायकों की पूजा उनकी वीरता के लिए करते हैं। लोग इलेक्ट्रोनिक एवं यांत्रिक उद्योगों को विलासिताएँ देने के लिए पूजते हैं। कुछ लोग अपने सम्बन्धियों को पूजते हैं। कुछ मुझे जैसे पतित जीव अभी भी UNIX operating system को पूजते हैं। कलयुग की स्थिति कुछ ऐसी है।

पर क्या हमें ज्ञात हैं कि हम चाहे किसी भी जाति या आश्रम में रहे, हम यह चार क्रियाएं श्रवण, गुणगान, स्मरण और पूजन करते ही हैं?

और क्या हमें ज्ञात हैं कि इन चारों क्रियाओं का केंद्र कोई भौतिक वस्तु न होकर सर्वोत्कृष्ट /आध्यात्मिक वस्तु होनी चाहिये?

क्या हमें ज्ञात है कि हमारा जीवन किस दिशा में बढ़ रहा है? क्या हमें ज्ञात है कि हमारा गंतव्य क्या हैं? और अगर हम अपने अंतिम गंतव्य को जानते हैं तो वहाँ पहुँचने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं? अगर हम अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए गंभीर है तो इन चारों क्रियाओं का विषय भौतिक क्यों हैं, सर्वोत्कृष्ट क्यों नहीं? हम फिजूल की चीजों को सुनने, गुणगान करने, याद करने अथवा पूजने में क्यों व्यर्थ समय नष्ट करते हैं? हम किसी कार्य को करने से पूर्व दो बार क्यों नहीं सोचते कि हम कृष्ण को ही याद कर रहे है या उनकी ही सेवा क्यों नहीं कर रहे हैं?

सूत गोस्वामी हमारी इस उलझन का उत्तर शौनक ऋषि की अध्यक्षता में प्रस्तुत नैमिशारान्य के ऋषियों के प्रश्नों के उत्तर के रूप में देते हैं। श्रीमदभागवत के १.२.१२ श्लोक में वे कहते हैं -

तस्मद एकेना मनसा भगवान सत्वतम पतिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्याश्च ध्येयः पुज्यश्चनित्यदा।।

इसलिए एकाग्र चित्त वृत्ति से, मनुष्य को निरंतर सर्वेश्वर भगवान्, जो भक्तों के रक्षक हैं, का श्रवण, गुणगान, स्मरण और पूजन करना चाहिए।

यहाँ हम इस श्लोक से हम समझते हैं कि गुणगान के वास्तविक विषय तो परमेश्वर भगवान् ही हैं जिन्होंने हमारे सामने सभी चीजों का सृजन किया हैं। अहम् सर्वस्य प्रभावों – कृष्ण घोषणा करते हैं कि सभी चीजों का स्रोत वही हैं। फिर गुणगान का विषय सभी चीजों के एकमात्र स्रोत के अलावा और कुछ कैसे हो सकता हैं? आदर्शरूप में जो हमें सब कुछ प्रदान करता है उसका ही पूजन, स्मरण, गुणगान और श्रवण होना चाहिये। कृष्ण की मर्जी के बिना तिनका भी नहीं हिल सकता हैं, तो फिर जगत में होने वाले बड़े परिवर्तनों का तो कहना ही क्या। इसलिए हमें इस जीवन के प्रत्येक क्षण में सिर्फ कृष्ण का ही स्मरण,गुणगान,पूजन और श्रवण करना चाहिए।

गाड़ी चलने का उदाहरण लेते हैं। अगर आप गाड़ी चला रहे हैं और गाड़ी की किसी गड़बड़ी के कारणवश वह अचानके से बंद हो जाती है। आप सड़क के बीच में हैं और घनघोर अँधेरा है। ऐसे अँधेरे में आप एकदम अकेले हैं और सोचेते हैं कि कोई आकर सहायता कर दे। और फिर संयोग से भगवान की कृपा से वहाँ कोई स्वेक्षा से आपकी गाड़ी ठीक करने में मदद के लिए आता है। उस समय आप क्या अनुभव करेंगे? कृतज्ञता और क्या? आप उस व्यक्ति के प्रति बहुत आभार अनुभव करेंगे। आप यह घटना जिंदगी भर याद रखेंगे। आप उस व्यक्ति की खूब प्रशंसा करेंगे जिसने आपकी गाड़ी ठीक की थी। अगर भौतिक दृष्टि से एक ऐसी घटना हमारे अन्दर कृतज्ञता भर सकती है तो कृष्ण के प्रति आभार क्यों नहीं जो सदैव ही हमें भौतिकता के अँधेरे से बाहर निकाल अपने धाम ले जाने के इच्छुक रहते हैं?

चलिए ऊपर दिए गए श्लोक के शब्द एकेना मनसा अर्थात एकाग्र चित्त से ध्यान पर ध्यान देते हैं। हमारे मन को इन चारों क्रियाओं स्मरण, पूजन, गुणगान, श्रवण पर एकाग्र हो कृष्ण पर ही केन्द्रित होना चाहिए। वो भक्तों के सबसे बड़े रक्षक हैं। जिस प्रकार से सौर ऊर्जा संपूर्ण ग्रह पर ही विस्तृत होती हैं, परन्तु उसका उपयोग मुख्यत: सौर ऊर्जा संयत्रों में होता है जहाँ सौर ऊर्जा को केंद्रीभूत करके संगृहीत कर भविष्य में प्रयोग के लिए रखा जा सकता है। विस्तृत सौर ऊर्जा कोई काम नहीं आ सकती। उसी प्रकार अगर हमारा मन एक साथ विभिन्न कार्यों में एक साथ लगा रहेगा, तब उसकी ऊर्जा व्यर्थ होगी, यह अतिमुल्यवान मनुष्य जन्म जो हमें इस शरीर में मिला है उसके भी व्यर्थ बर्बाद होने का खतरा होगा। हमें इस श्लोक को गंभीरता से लेना होगा, हमें ईमानदारी से प्रयास करना होगा कि हम अपने मन का प्रयोग सिर्फ कृष्ण के ही स्मरण में लगायेंगे। अगर हम सिर्फ भक्तिमयी सेवा के बारे में ही सोचेंगे तब हमारी बाकी इन्द्रिया जैसे जिह्वा अपने आप स्वतः ही मन का अनुगमन करेंगी और स्वतः ही सिर्फ कृष्ण के बारे में ही बात करेंगी। हमारी जिह्वा परम सत्य का गुणगान करने लगेगी। हमारे कान भी मन का अनुगमन कर सिर्फ परम सत्य के बारे में ही सुनकर सुख पाएंगे। इन सब चीजों का स्थायी प्रभाव हमारे मन पर पड़ेगा जिससे हमारे स्मरण में सिर्फ कृष्ण की सेवा ही होगी। इस प्रकार हम निरंतर भगवान श्री कृष्ण के पूजन और सेवा में लगे रहेंगे।

मैं भगवान् श्री कृष्ण, श्रील प्रभुपाद, श्रील गुरुदेव के पादपद्मों में प्रार्थना करती हूँ कि मैं इन चारों क्रियाओं के प्रयोग श्रवण, गुणगान, स्मरण, और पूजन से कृष्ण की सेवा करूँI

बहुत बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरदेव की सेवा में रत आपकी,
विनयशीला देवी दासी,
इंदौर