माता पिता का आदर करना

हिन्दी अनुवाद : अंकिता मावंडिया

प्रुफ रीडींग : भक्तिन बेनू

मैंने हमारे अतिप्रिय गुरुदेव के भगवद्गीता के श्लोक २.१४ पर दिए गए प्रवचन को सुना था। सबके लाभ के लिए मैंने उनके अमृतमय शब्दों को यहाँ संकलित करने का विचार किया है।

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा:।
आगमापायिनो ‘नित्यास्तान्स्तितिक्षस्व भारत।। 

हे कुन्तीपुत्र! सुख तथा दुःख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान, सर्दी तथा गर्मी की ऋतुओं के आने जाने के समान है। हे भारतवंशी! वे इन्द्रियबोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिये कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखे।”

ऊपर दिया गया श्लोक त्रिताप से मुक्ति पाने का उपाय है। अगर हम ध्यानपूर्वक सोचे तो आध्यात्मिक, आदिभौतिक और आदिदैविक क्लेशों से मुक्ति का कोई उपाय नहीं है। उनका सामना करने का एकमात्र मार्ग उनको सहन करना है। श्री कृष्ण भी यहाँ यही कह रहे हैं कि सभी सुख अथवा दुःख जो हम अपने जीवन में पाते हैं अस्थायी होते हैं। उनका आना जाना शरद अथवा ग्रीष्म ऋतु के समान लगा रहता है। इसलिए हमें उन्हें सहन करना सीखना होगा। “सीखना” इस श्लोक का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण शब्द है।

Supercomputers के इस युग में, हमने अपनी दाल रोटी कमाने के लिए सब कुछ सीख लिया है। हमारे आस पास लोग अभी भी नयी चीजें सीख कर अपनी ज्ञान की प्यास बुझाने में व्यस्त हैं। पर ज्ञान की सार्थकता उनको अभ्यासित करने में ही है। आज के माता पिता अपने बच्चों को हर शैक्षणिक ज्ञान सिखाते हैं। वे उन्हें साधारण नैतिक शिष्टाचार भी सिखाते हैं। वे उन्हें पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कला, खेल और भी बहुत सी चीजें अपनी रूचि के अनुरूप सिखाने के लिया प्रयासरत रहते हैं। परन्तु वे एक चीज भूल जाते हैं। वे भूल जाते है कि उन्हें अपने बच्चों को जीवन की मुश्किलों का सामना करना सिखाना हैं जो कि सबसे महत्त्वपूर्ण शिक्षा है। बच्चे अपने आप सीखते हैं अपने अच्छे बुरे अनुभवों से। पर यह कलयुग है। एक बच्चा बिना प्रशिक्षण के संसार के क्लेशों में फैंक सा दिया जाता है। बच्चे का संघर्ष उसके विद्यालय में प्रवेश करते के साथ हो जाता है, अपने माता पिता का आश्रय चाहे ३-४ घंटों के लिए ही छोड़ना क्यों ना पड़े। बच्चा बहुत सी चीजें अपने आप ही सीखने लगता है। जैसे ही बच्चा अपने घर से कदम बाहर रखता है वह अपने माता पिता के नियंत्रण से बाहर होता है। सो ऐसी स्थिति में माता पिता को क्या करना चाहिये? वे उसे २४/७ निगरानी में नहीं रख सकते। यहाँ वैदिक संस्कृति परिदृश्य में आती है। दुर्भाग्यवश आज के परिवार छोटी छोटी महत्वपूर्ण बातों को भूल गए हैं। वैदिक संस्कृति में बच्चों को शास्त्रों के निर्देशों के अंतर्गत प्रशिक्षित किया जाता है। वैदिक संस्कृति बच्चे को इस जगत की सभी संभव मुसीबतों से अवगत करा उनका सामना करने की तकनीक भी सिखाती है। जैसा कि ऊपर दिए गए भगवद्गीता के श्लोक में कहा गया है कि कुछ ऐसी मुसीबतें होती हैं जिनका कोई समाधान नहीं होता है, उन्हें केवल सहन किया जा सकता है। नई पीड़ी को यह ज्ञान दिया जाना चाहिये ताकि वे फिर कभी हताशा और उदासीनता या किसी आध्यात्मिक क्लेशों में ना पड़े जो कि आदिभौतिक और आदिदैविक क्लेशों के प्रतिफल हो सकते हैं।

वास्तविक जीवन में उदाहरण स्वरूप देती हूँ। मेरे विद्यालय में एक मित्र था जिसने विद्यालय में कक्षा १ से लेकर १० तक हमेशा अव्वल परिणाम पाया था। वो कुशल छात्र था जिसका कक्षा में कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। हालाँकि कक्षा १२ में उसने कम अंक प्राप्त किये जिसका प्रभाव उसके आगे के करियर की योजनाओं पर भी पड़ा। उसका अहम् चूर चूर हो गया था, सपने टूट गए थे क्योंकि उसे विफलता की आदत नहीं थी। वह अवसाद ग्रस्त हो गया और उसके जीवन के कुछ साल इससे उबरने में निकल गए। निकट काल में, मैं उससे मिली, तब उसने बताया कि इस घटना के कारण उसे स्थापित होने में इतनी देर लगी। तब मैंने यह सोचा कि अगर उसे इन बुरी परिस्थितियों को सहन करना आता तो यह उसके लिए कितना सहायक हो सकता था। भगवद्गीता का मात्र एक श्लोक उसे इस स्थिति का सामना करने में सहायक होता। मैंने यह भी सीखा, आज के माता पिता किस प्रकार अपने बच्चों को जीवन की मुसीबतों का सामना करने के लिए तैयार करने में विफल हो रहे हैं। आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को अन्दर से सशक्त करने के लिए अति आवश्यक है।

श्रील प्रभुपाद इस श्लोक के तात्पर्य के प्रथम वाक्य में ही कह रहे हैं, “कर्त्तव्य निर्वाह करते हुए मनुष्य को सुख तथा दुःख के क्षणिक आने जाने को सहन करने का अभ्यास करना चाहिये।” महाराज कहते हैं, “यह इस तात्पर्य का ध्येय वाक्य हैं। अगर किसी को आसक्ति और औरों के प्रति घृणा से मुक्त होना है तो, राग द्वेष विमुक्तैस्तु, तब उसे अपने कर्त्तव्य करने चाहिये और फिर सब भूल जाना चाहिये। इस प्रकार वह परिणामों के प्रति चिंता मुक्त हो उनसे अनासक्ति विकसित कर सकता है। हमें अपने कर्त्तव्य अच्छी तरह से करने चाहिये और बाकी सब कृष्ण पर छोड़ उनकी कृपा पर आश्रित होना चाहिये। जब हवाई जहाज में भू तल से ३५००० फिट की ऊँचाई पर हमारी रक्षा कौन करता है? यह कृष्ण की ही कृपा होती हैं जो हम वापिस धरती पर उतर पाते हैं। इसलिए हमें अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिये। ईमानदारी का होना अनिवार्य है।

तब महाराज ने बड़ों और माता पिता के प्रति अपने कर्तव्यों पर जोर दिया। इस विषय के प्रति उन्होंने विशेष रूप से बात की। उन्होंने कहा,” अगर तुम घर पर हो तो अपने पिता की यथा सामर्थ्य श्रेष्ठ रूप से सहयोग करो। पिता तुम्हे बहुत आशीष देंगे। माता पिता हमें ऐसे भी आशीष देते हैं। लेकिन अगर पुत्र उनकी सहायता करता है, तो वही आशीष ह्रदय से आता है। जो पहली चीज हम करते हैं वो है माता पिता की अनदेखी। यह आज का आधुनिक प्रचलन है। यह जान लो कि हम सौभाग्यशाली है कि हमें उनका साथ मिला हैं। तुम्हे कही भी माता पिता नहीं मिलेंगे। बाकी सब कुछ मिल सकता है परन्तु माता पिता कही और नहीं मिलते। इसलिए बिना किसी दूसरे विचार के तुम्हे बड़ों का आदर करना चाहिये।” महाराज आगे फिर कहते हैं, “मुझे बहुत बुरा लगता है अगर बच्चे माता पिता की अवज्ञा करते हैं। माता पिता ने बच्चों के प्रति कौन सा अपराध किया है? उन्हें माता पिता की आज्ञाओं का पालन क्यों नहीं करना चाहिये जब वे सिर्फ उनका भला ही चाहते हैं? एक पिता कितनी तकलीफें उठा कर पैसे कमाकर अपने परिवार को आरामदायक जीवन देना चाहता है। एक बच्चे को अपने पिता के प्रति आभार एवं कृतज्ञता का अनुभव होना ही चाहिये। उसके बदले में उसे बिना तर्क के पिता की आज्ञाओं का पालन करना चाहिये। और फिर जब पुत्र बड़ा हो जाए, तब उसे अपने वृद्ध माता पिता को सुख देना चाहिये। इस प्रकार कृष्ण भी प्रसन्न होते हैं।

प्रत्येक मनुष्य क्षणिक सुख अथवा दुःख अनुभव करता है। परन्तु इस क्षण हम कृष्ण कृपा से कम व्यथित हैं। इसलिए हमें उन लोगों की सहायता करनी चाहिये जो क्षणिक सुख तथा दुःख से पीड़ित हैं। भगवद्गीता यही है। अन्यथा उसका कोई अर्थ नहीं है। यह वाक्य अति शक्तिशाली है- “सुचारू रूप से कर्त्तव्य निर्वाह करते हुए, मनुष्य को सुख तथा दुःख के क्षणिक आने जाने को सहन करने का अभ्यास करना चाहिये।” प्रभुपाद कहते है, “सुचारू रूप से कर्तव्यों का निर्वाह”, अव्यवस्थित निर्वाह नहीं। तुम जहाँ भी हो, अपने कर्तव्यों को पूरा करो। हिंदी में एक प्रसिद्ध उक्ति है, भागो मत, जागो” हमें अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होना चाहिये। हमें उनसे भागना नहीं चाहिये। अगर हम रोगी हैं, या दुर्घटना ग्रस्त हैं तब हमें सहन करना पड़ेगा। हमारा शरीर बड़ों से ज्यादा नया है। बड़ों को विभिन्न शारीरिक कष्टों को सहन करना पड़ता हैं। उन्हें यह सहन करना कष्टकर लगता है क्योंकि उनका शरीर वृद्ध हो रहा होता है। वे अपने जीवन के अंत की ओर अग्रसर होते हैं। जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं समय हमारे विपरीत चलने लगता है। इसलिए आप जहाँ पर भी रहे, कृपया बड़ों की अनदेखी ना करें। अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह पूरा करें। तब हम कृष्ण को प्रिय होंगे। अपने कर्तव्यों के पालन के लिए हमें उत्सुकता के साथ अपने पाँव के अन्घुटों पर खड़े रहना चहिये। एक अन्घुटे पर तैयार रहना चाहिये। क्योंकि अभी हमारा शरीर स्वस्थ है।”

महाराज बार बार जोर देते हैं, ” तुम जहाँ पर भी रहो, अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहो। इस भौतिक जगत में जो लोग कृष्ण को अपने साथ लेकर चलते हैं, वे आम लोगों से ऊपर हैं। हम किसी से द्वेष नहीं रखते और ना ही किसी के प्रति आसक्त है। हम किसी का अनुचित फायदा नहीं उठाते। अगर मुझ पर कोई आश्रित है तो मैं उस पर ध्यान नहीं दूंगा। यह भौतिकवाद है। भक्तों में शोषण का भाव अनुपस्थित है। यह हमारे व्यवहार में सदृश होना चाहिये।”

गुरुदेव ने प्रवचन का अंत इस निर्देश के साथ किया, ” जब भी आप एकांत में हो, इन तत्पर्यों पर विचार कीजिये।”

मैं श्रील गुरुदेव, श्रील प्रभुपाद और श्री कृष्ण के पादपद्मों में प्रार्थना करती हूँ कि वो मुझे हर कष्ट को सहन करने की शक्ति दे और मैं ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकूँ। मैं अपने माता पिता की अवज्ञा स्वप्न में भी ना करूँ।

बहुत बहुत धन्यवाद।
श्रील प्रभुपाद और श्रील गुरदेव की सेवा में रत आपकी,
विनयशीला देवी दासी,
डलहौज़ी, हिमाचल प्रदेश

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